Sonbhadra News : शिक्षा विभाग का हाल बेहाल, कहीं बच्चे कम तो कहीं टीचर नदारत, कहीं चल रहा अटैचमेंट का खेल
शिक्षा विभाग में जिस तरह से लगातार मामले आ रहे हैं उससे अब यह सवाल खड़ा होने लगा कि क्या सोनभद्र आकांक्षी जनपद की दंश से बाहर निकल पायेगा ?


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शिक्षा विभाग में जिस तरह से लगातार मामले आ रहे हैं उससे अब यह सवाल खड़ा होने लगा कि क्या सोनभद्र आकांक्षी जनपद की दंश से बाहर निकल पायेगा ?

शान्तनु कुमार
★ बच्चों के भविष्य को लेकर नहीं है गंभीर
★ बड़ा सवाल, आखिर कैसे आकांक्षी जनपद की दंश से बाहर आएगा सोनभद्र
सोनभद्र । शिक्षा विभाग में जिस तरह से लगातार मामले आ रहे हैं उससे अब यह सवाल खड़ा होने लगा कि क्या सोनभद्र आकांक्षी जनपद की दंश से बाहर निकल पायेगा ? जहां एक तरफ़ स्कूल में बच्चों के नामांकन के बाद उपस्थिति को लेकर सवाल उठते रहे हैं वहीं दूर-दराज के स्कूलों में टीचरों की उपस्थिति भी सवालों के घेरे में है । सूत्रों के मुताबिक बच्चों की उपस्थिति का आलम यह है कि 90 प्रतिशत उपस्थिति को पूरा करने के लिए कई स्कूलों के अध्यापक बच्चों की उपस्थिति कम रहने के वावजूद मिड डे मील में संख्या बढ़ाकर दिखा देते हैं ताकि शासन को नोट होने वाली संख्या में फंस न सके । इसी संख्या के खेल में टीचरों को कन्वर्जन कास्ट का फायदा भी मिल जाता है ।
टीचरों की उपस्थिति का खेल भी किसी से छिपा नहीं है, कई स्कूलों के टीचर तो सेटिंग कर महीनों स्कूल नहीं आते जबकि कई आपस में दिन तय कर लिए हैं कि कौन किस दिन आएगा । स्कूल में खाने का मीनू भले ही सेट न हो मगर आपस का मीनू सेट है कि किसे कब आना है और मामला फंसने पर क्या बताना है ।
स्कूल के लिए सिर्फ अध्यापक ही जिम्मेदार है ऐसा नहीं है । इसके लिए कहीं ना कहीं जिले के अधिकारी भी जिम्मेदार हैं । यदि हम बात करें शिक्षा विभाग की तो लगभग सभी एबीएसए अपने कामकाज को निपटने के लिए कुछ टीचरों को अपने यहां अटैच कर रखा है। वहीं बेसिक शिक्षा अधिकारी के अलावा जिले के कई विभागों में अध्यापक अपनी सेवाएं दे रहे हैं । अध्यापक भी चाहते हैं स्कूलों में बच्चों के झंझट से निकलकर अधिकारियों की सेवा में लगे रहें । अध्यापकों को पता है कि उन्हें कौन सा अपने बच्चों की चिंता करनी है, क्योंकि उनके बच्चे तो किसी अच्छे स्कूलों में पढ़ रहा है । भले ही सरकार ने उनकी नियुक्ति बच्चों की पढ़ाने के लिए की हो मगर उन्हें मूल काम को छोड़कर बाकी सब काम करा लें उसमें उन्हें संतुष्टि मिलती है ।
कुल मिलाकर अटैचमेंट का खेल भले ही शिक्षा नीति में ना हो मगर जिले के अधिकारी अपना काम निकालना बखूबी जानते हैं । अब अधिकारियों को पूरी नौकरी सोनभद्र में करनी हैं, उन्हें भी फ्री का काम करने वाला हैंड्स मिल जाता है तो वे भी खुश हैं, चाहे बच्चे पढ़ें या ना पढ़े । शायद यही कारण है कि अध्यापकों पर इसी वजह से पूरी तरह से दबाव नहीं बन पाता ।
हाल ही में बेसिक शिक्षा अधिकारी ने म्योरपुर ब्लॉक के एआरपी अखिलेश देव पांडे पर कार्य में लापरवाही बरतने के आरोप में वेतन रोकने का आदेश जारी किया है। वही म्योरपुर ब्लॉक के ही कंपोजिट विद्यालय बीजपुर में अनुशासनहीनता को लेकर बीएसए ने बड़ी कार्यवाही करते हुए तीन सहायक अध्यापकों व एक अनुदेशक को प्रतिकूल प्रविष्टि थमा दिया। साथ ही वार्षिक वेतन वृद्धि को तत्काल अस्थाई रूप से अवरुद्ध करने का निर्देश भी दिया है । बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यवाही से साफ है कि स्कूल में अध्यापकों की किस तरह मनमानी चल रही है । लेकिन यह मनमानी पूरी तरह थमेगा कैसे यह बड़ा सवाल है, इस पर काम करने की जरूरत है ।
इतना ही नहीं अभी हाल ही में 25 फरवरी को रावर्ट्सगंज ब्लॉक के कम्पोजिट विद्यालय में प्रधानाध्यापक पर जय श्री राम का नारा लगाने वाले बच्चों को पीटने का आरोप लगा हालांकि इस मामले में जांच चल रही है। अब जांच रिपोर्ट में क्या आएगा यह तो बाद में पता चल सकेगा लेकिन स्कूल में इस तरह का माहौल रहेगा तोआखिर कैसे पढ़ेंगे और कैसे बढ़ेंगे ।
कुल मिलाकर सरकार ने शिक्षा विभाग का बजट भले ही बढ़ा दिया है । लेकिन जिन अधिकारियों व शिक्षकों के भरोसे सरकार सरकारी विद्यालय को कॉन्वेंट की तर्ज पर आगे ले जाना चाहती है वही स्कूल के लिए अभिशाप बने हुए हैं। कहीं स्कूलों में पार्टियां चल रही है तो कहीं टीचर स्कूलों से गायब है तो कई स्कूल का काम न कर निजी कार्यों में जुटे हुए हैं । ऐसे में जरूरत है सरकार को कड़ी मॉनिटरिंग व कड़ी कार्यवाही किये जाने की, ताकि स्कूल व बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले जल्द हिमाकत न कर सके ।
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