Sonbhadra News : किताब माफिया पर क्यों बेअसर प्रशासन? छापेमारी के बाद भी जारी मनमानी
जिले में इन दिनों स्कूलों की किताबों की बिक्री को लेकर उठ रहे सवालों के बीच शिक्षा विभाग की कार्रवाई पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं। हालात यह हो गया हैं कि "मुंदेहूं आँख कतहूं कछु नहीं..........

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8:32 PM, April 9, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । जिले में इन दिनों स्कूलों की किताबों की बिक्री को लेकर उठ रहे सवालों के बीच शिक्षा विभाग की कार्रवाई पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं। हालात यह हो गया हैं कि "मुंदेहूं आँख कतहूं कछु नहीं......." की कहावत मानो जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारी और डीआईओएस की कार्यप्रणाली पर सटीक बैठती नजर आ रही है। दोनों अधिकारी लगातार स्कूलों और दुकानों पर छापेमारी के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बाजार में विद्यालयों से जुड़ी किताबों की बिक्री आज भी धड़ल्ले से जारी है।
वहीं अभिभावकों का कहना है कि हर साल की तरह इस बार भी कई निजी विद्यालयों से जुड़ी किताबें बाजार में तय दुकानों पर ही मिल रही हैं। आरोप है कि स्कूलों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से अभिभावकों को उन्हीं दुकानों से किताबें खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। ऐसे में शिक्षा विभाग की छापेमारी अभियान की सच्चाई भी धीरे-धीरे सामने आती दिख रही है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब प्रशासन अन्य मामलों में बुलडोजर के कार्रवाई की बात करता है, तो शिक्षा माफियाओं के सामने यह बुलडोजर आखिर क्यों पंचर हो जाता है। बाजार में खुलेआम बिक रही विद्यालयों की किताबें इस बात का संकेत दे रही हैं कि कार्रवाई के दावे और जमीनी सच्चाई में काफी अंतर है।
आरोप यह भी है कि जिले के शिक्षा विभाग के अधिकारी कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकता निभा रहे हैं। कई मामलों में विद्यालय प्रबंधन द्वारा NCERT की किताबों से पढ़ाई कराए जाने का आश्वासन मिलते ही अधिकारी उसी पर भरोसा कर जांच को आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं समझते। इससे न तो अभिभावकों की शिकायतों का समाधान हो पाता है और न ही स्कूलों और दुकानदारों की मनमानी पर कोई प्रभावी रोक लग पाती है।
इस पूरे खेल का सबसे ज्यादा असर अभिभावकों पर पड़ रहा है। महंगी किताबें खरीदने के लिए उन्हें हर साल अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है। कई अभिभावकों का कहना है कि एक बच्चे की किताबों का खर्च ही हजारों रुपये तक पहुंच जाता है, जिससे मध्यम और गरीब वर्ग के परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।



