Sonbhadra News : 'कॉरपोरेट कब्जे' के खिलाफ उबला वनांचल, किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा के समर्थन में सड़कों पर उतरा आदिवासी समुदाय
सदियों से जिन जंगलों, पहाड़ों और नदियों को आदिवासी अपनी मां, अपनी पहचान और अपनी विरासत मानते आए हैं, उन पर एक बार फिर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। विंध्य क्षेत्र के घने जंगलों और पहाड़ियों में......

कॉरपोरेट कब्जे के विरुद्ध प्रदर्शन करते आदिवासी......
sonbhadra
4:11 PM, June 11, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । सदियों से जिन जंगलों, पहाड़ों और नदियों को आदिवासी अपनी मां, अपनी पहचान और अपनी विरासत मानते आए हैं, उन पर एक बार फिर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। विंध्य क्षेत्र के घने जंगलों और पहाड़ियों में प्रस्तावित पंप्ड स्टोरेज पावर (पीएसपी) परियोजनाओं के खिलाफ आज आदिवासियों का गुस्सा फूट पड़ा। किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा के बैनर तले बड़ी संख्या में आदिवासी, किसान और ग्रामीण एकजुट हुए और जल, जंगल, जमीन तथा अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करने का संकल्प लिया।
वहीं प्रदर्शन के दौरान आदिवासियों ने आरोप लगाया कि विकास के नाम पर उनकी पुश्तैनी जमीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों को बड़े कॉरपोरेट घरानों के हवाले करने की तैयारी चल रही है। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि जंगल उनके लिए सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति, इतिहास, परंपरा और जीवन का आधार हैं। यदि जंगल खत्म हुए तो आदिवासी समाज की पहचान और अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा।
किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा के संयोजक संदीप मिश्रा ने आंदोलन को संबोधित करते हुए कहा कि "एक ओर वह वर्षों से "पेड़ है तो प्राण है" अभियान चला रहे हैं और देश के प्रधानमंत्री "एक पेड़ मां के नाम" का संदेश दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सोनभद्र के जंगलों और पहाड़ों में हजारों पेड़ों की बलि देकर परियोजनाओं का रास्ता तैयार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण की बातें करने वाली व्यवस्था आखिर किस विकास मॉडल को आगे बढ़ाना चाहती है, जहां जंगल बचाने की जगह उन्हें खत्म करने की तैयारी हो रही है।उन्होंने दावा किया कि जिले में विभिन्न निजी कंपनियों द्वारा प्रस्तावित पीएसपी परियोजनाओं के लिए कुल 3,147 हेक्टेयर भूमि चिन्हित की गई है। इनमें ग्रीनको 700 हेक्टेयर, जेएसडब्ल्यू 575 हेक्टेयर, अडानी 237 हेक्टेयर, अबादा 275 हेक्टेयर, अमुनोरा 337 हेक्टेयर, टोरेंट 725 हेक्टेयर और टीएचडीसी 301 हेक्टेयर जैसी कंपनियां शामिल हैं। उनका आरोप था कि इन परियोजनाओं की कीमत आदिवासी, किसान और ग्रामीण अपने घर, खेत और जंगल खोकर चुकाएंगे, जबकि लाभ कॉरपोरेट घरानों को मिलेगा।"
संदीप मिश्रा ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर भी तीखा हमला बोलते हुए कहा कि "जनता की आवाज बनने का दावा करने वाले लोग आज कॉरपोरेट हितों के पक्षधर दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासियों की जमीन और अस्मिता बचाने के बजाय कुछ जनप्रतिनिधि सिर्फ अपनी राजनीतिक जमीन बचाने में लगे हैं। अपने संबोधन में उन्होंने सोनभद्र के पुराने औद्योगिक और ऊर्जा परियोजनाओं से प्रभावित लोगों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि जिले में वर्षों से स्थापित परियोजनाओं के बावजूद स्थानीय लोगों को अपेक्षित रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल सकीं। उल्टा प्रदूषण, विस्थापन और बीमारियों का बोझ यहां के लोगों को उठाना पड़ा है।"
वहीं आंदोलन में शामिल ग्रामीणों ने कहा कि प्रस्तावित पीएसपी परियोजनाओं से उनकी खेती, पशुपालन, जल स्रोत और वन आधारित आजीविका पर सीधा संकट खड़ा हो जाएगा। उनका कहना था कि जिन जमीनों पर परियोजनाओं की नजर है, वही उनके परिवारों के भरण-पोषण का मुख्य आधार हैं। यदि ये जमीनें चली गईं तो हजारों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा।
ग्रामीणों ने कहा कि जिले में पहले भी कई बड़ी परियोजनाएं लगीं, लेकिन उनका लाभ स्थानीय लोगों तक नहीं पहुंच सका। उनका आरोप था कि परियोजनाओं का मुनाफा कंपनियां कमाती हैं, जबकि प्रदूषण, विस्थापन और सामाजिक संकट का दंश स्थानीय लोगों को झेलना पड़ता है।
किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि जनता की सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण और जंगलों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। संघर्ष को गांव-गांव तक ले जाकर जिला मुख्यालय से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक आवाज बुलंद की जाएगी।
इस दौरान रामसूरत खरवार, लक्षन खरवार, योगेन्द्र, विन्दू खरवार, मुखलाल चेरो, राधा पनिका, गीता, मनोज निषाद, राजू पासवान समेत बड़ी संख्या में आदिवासी और ग्रामीण मौजूद रहे।




