Sonbhadra News : डीह बाबा स्थल पर आदिवासी महापंचायत, पुश्तैनी जमीन और जंगल बचाने को बनी रणनीति
जल, जंगल और जमीन के सवाल पर मंगलवार को तरिया क्षेत्र के ससनयी स्थित डीह बाबा स्थल पर आदिवासी समाज की बड़ी पंचायत देखने को मिली। सैकड़ों की संख्या में जुटे आदिवासी परिवारों ने अपनी पुश्तैनी जमीन.....

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11:32 PM, June 23, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
• डीह बाबा स्थल पर उमड़ा आदिवासी जनसैलाब, भूमि अधिकार और लाखों पेड़ों की कटाई के खिलाफ बुलंद हुई आवाज
• पूर्वजों की विरासत बचाने का संकल्प, सरकार से उच्चस्तरीय जांच की मांग
सोनभद्र । जल, जंगल और जमीन के सवाल पर मंगलवार को तरिया क्षेत्र के ससनयी स्थित डीह बाबा स्थल पर आदिवासी समाज की बड़ी पंचायत देखने को मिली। सैकड़ों की संख्या में जुटे आदिवासी परिवारों ने अपनी पुश्तैनी जमीन, वनाधिकार और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए कथित भूमि हस्तांतरण और बड़े पैमाने पर पेड़ कटान के खिलाफ आवाज बुलंद की। सभा में वक्ताओं ने कहा कि यदि आदिवासियों के अधिकारों पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण हुआ तो उसका लोकतांत्रिक लेकिन निर्णायक विरोध किया जाएगा।
सभा को संबोधित करते हुए किसान नेता संदीप मिश्र ने कहा कि "जल, जंगल और जमीन ही आदिवासी समाज की असली जीवन बीमा योजना हैं। इन्हीं के सहारे पीढ़ियां जीवित हैं और इन्हीं से उनका अस्तित्व जुड़ा है।" उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा फर्जी हस्ताक्षर और मोहरों के माध्यम से पूर्वजों की संपत्तियों और अधिकारों को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि किसी भी आदिवासी परिवार की जमीन या आवास को नुकसान पहुंचाने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
कार्यक्रम में "पेड़ हैं तो प्राण हैं" अभियान के जिला संयोजक रामसूरत खरवार ने पर्यावरणीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हुए कहा कि एक ओर सरकारी स्तर पर विकास कार्यों को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर क्षेत्र में लाखों पेड़ों की कटाई की चर्चाएं लोगों के बीच गहरी चिंता पैदा कर रही हैं। उन्होंने कहा कि यदि वास्तव में इतनी बड़ी संख्या में पेड़ काटने की अनुमति दी गई है तो सरकार और संबंधित विभागों को पूरी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि वर्षों से वन विभाग द्वारा करोड़ों पौधे लगाए जाने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन आज उन पौधों का वास्तविक आंकड़ा और स्थिति क्या है, यह जनता को बताया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, परंपरा, जल स्रोतों और जैव विविधता की आधारशिला हैं।
डीह बाबा स्थल पर आयोजित सभा के दौरान कई वक्ताओं ने कहा कि विकास के नाम पर यदि स्थानीय लोगों के अधिकारों और पर्यावरण की अनदेखी की जाएगी तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा। ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री से पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कराए जाने, आदिवासियों के वनाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा जल, जंगल और जमीन से जुड़े मामलों में पारदर्शिता लाने की मांग की।
सभा में मौजूद लोगों ने पूर्वजों की धरती और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा का सामूहिक संकल्प लेते हुए कहा कि जंगल बचेंगे तो संस्कृति बचेगी, संस्कृति बचेगी तो समाज बचेगा।
इस अवसर पर बासमती गोंड़, गुलाबी चेरो, रामसूरत खरवार, कन्हैया चेरो, जोगेंद्र यादव, दिनेश चेरो, विंदू खरवार, आकाश चौहान, मुखलाल चेरो, गुलाब चेरो सहित सैकड़ों आदिवासी परिवारों के सदस्य मौजूद रहे।




