Sonbhadra News : दिव्यांगों के सम्मान पर सिस्टम का तमाचा, सीएमओ कार्यालय में फर्श पर पड़े रहे दिव्यांगजन
दिव्यांगजनों के कल्याण और सम्मान को लेकर प्रदेश सरकार भले ही संवेदनशील होने का दावा करती हो, लेकिन सोमवार को मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय परिसर में जो तस्वीर सामने आई, उसने इन दावों पर कई सवाल.......

सीएमओ कार्यालय में फर्श पर बैठने और लेटने को विवश दिव्यांग....
sonbhadra
5:07 PM, June 15, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । दिव्यांगजनों के कल्याण और सम्मान को लेकर प्रदेश सरकार भले ही संवेदनशील होने का दावा करती हो, लेकिन सोमवार को मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय परिसर में जो तस्वीर सामने आई, उसने इन दावों पर कई सवाल खड़े कर दिए। दिव्यांग प्रमाण पत्र बनवाने पहुंचे दर्जनों दिव्यांगजन भीषण गर्मी में जमीन पर बैठने और लेटने को मजबूर दिखे। न उनके बैठने के लिए कुर्सियां थीं और न ही गर्मी से राहत देने के लिए कूलर की व्यवस्था।
सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय में प्रत्येक सोमवार को आयोजित होने वाले दिव्यांग प्रमाण पत्र शिविर में आमतौर पर दिव्यांगों के बैठने के लिए कुर्सियां और गर्मी से बचाव के लिए कूलर लगाए जाते रहे हैं लेकिन इस बार अचानक सारी व्यवस्थाएं गायब थीं। इससे दिव्यांगजनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
शिविर का हाल, न डॉक्टर, न कूलर सिर्फ अव्यवस्था -
मौके पर मौजूद कई दिव्यांगों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वे सुबह से ही प्रमाण पत्र बनवाने के लिए कार्यालय पहुंचे थे, लेकिन घंटों बीत जाने के बाद भी न तो संबंधित चिकित्सक मौजूद थे और न ही कोई अधिकारी उनकी समस्याओं को सुनने के लिए सामने आया। थक-हारकर कई दिव्यांगजन फर्श पर ही बैठ गए, जबकि कुछ लोग गर्मी और कमजोरी के कारण लेटने को मजबूर हो गए। उनका कहना था कि पिछले वर्षों और हाल के अधिकांश शिविरों में बैठने के लिए कुर्सियां तथा गर्मी से राहत के लिए कूलर लगाए जाते थे, लेकिन इस बार पूरी व्यवस्था भगवान भरोसे छोड़ दी गई।
कुर्सियां और कूलर आखिर गए कहां -
दिव्यांगों और वहां मौजूद लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही चर्चा का विषय बना रहा कि आखिर हर सोमवार को लगने वाली कुर्सियां और कूलर अचानक कहां गायब हो गए। क्या यह व्यवस्था नवागत मुख्य चिकित्साधिकारी के निर्देश पर हटाई गई, या फिर किसी ने जानबूझकर व्यवस्थाओं को हटाकर नवागत सीएमओ की कार्यशैली पर सवाल खड़े करने की कोशिश की? फिलहाल इसका जवाब किसी के पास नहीं है और यह सवाल अभी भविष्य के गर्त में छिपा हुआ है। हालांकि, इतना जरूर है कि इस पूरे घटनाक्रम का खामियाजा उन दिव्यांगजनों को भुगतना पड़ा, जो अपनी शारीरिक परेशानियों के बावजूद सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं।
क्या दिव्यांगों की गरिमा का नहीं है कोई मूल्य -
तापमान 40 डिग्री के आसपास और उमस चरम पर थी। ऐसे हालात में दिव्यांगजन अपने सहारे फर्श पर बैठे रहे, जबकि जिम्मेदारों की ओर से न पीने के पानी की समुचित व्यवस्था दिखाई दी और न ही गर्मी से राहत दिलाने का कोई इंतजाम। सवाल यह है कि जब सामान्य व्यक्ति इस गर्मी में कुछ मिनट खड़ा नहीं रह सकता, तब शारीरिक रूप से असहाय दिव्यांगों को घंटों तक इस स्थिति में छोड़ देना क्या प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा नहीं है?
दावे बड़े-बड़े, हकीकत शर्मनाक -
सरकारी मंचों से दिव्यांग सशक्तिकरण, समावेशी विकास और सम्मानजनक व्यवहार की बातें की जाती हैं, योजनाओं का बखान किया जाता है। वहीं दूसरी ओर मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय में प्रमाण पत्र बनवाने आए दिव्यांगों को फर्श पर बैठना या लेटना पड़े, यह व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। सवाल यह भी है कि जब हर सप्ताह ये व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई जाती थीं तो इस बार ऐसी कौन सी परिस्थिति उत्पन्न हो गई कि दिव्यांगों के लिए बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं कराई जा सकीं।
नवागत सीएमओ के सामने पहली बड़ी चुनौती -
हाल ही में जनपद की स्वास्थ्य व्यवस्था की कमान संभालने वाले नवागत मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ0 रमेश कुमार मिश्रा के सामने यह पहला बड़ा संवेदनशील मामला बनकर उभरा है। दिव्यांग प्रमाण पत्र शिविर में अव्यवस्थाओं और दिव्यांगजनों की दुर्दशा ने न केवल स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि विभागीय संवेदनशीलता की भी परीक्षा ले ली है। ऐसे में अब सभी की निगाहें नवागत सीएमओ पर टिकी हैं कि वह इस मामले को महज एक सामान्य लापरवाही मानकर नजरअंदाज करते हैं या फिर जिम्मेदारों की जवाबदेही तय कर दिव्यांगजनों के सम्मान और सुविधाओं को प्राथमिकता देने का संदेश देते हैं।




