Sonbhadra News : 18 माह से अटका टीबी मरीजों का पोषण भत्ता, 'टीबी मुक्त भारत' के दावों पर उठे सवाल
एक ओर सरकार वर्ष 2026 तक देश को टीबी मुक्त बनाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर इलाज करा रहे हजारों टीबी मरीज पिछले 18 महीने से अपने पोषण भत्ते के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। कागजों पर चल रहे.....

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sonbhadra
7:32 AM, June 29, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । एक ओर सरकार वर्ष 2026 तक देश को टीबी मुक्त बनाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर इलाज करा रहे हजारों टीबी मरीज पिछले 18 महीने से अपने पोषण भत्ते के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। कागजों पर चल रहे राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम की जमीनी हकीकत यह है कि मरीजों को दवाएं तो मिल रही हैं, लेकिन पौष्टिक आहार के लिए मिलने वाली सहायता राशि महीनों से बंद पड़ी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि बिना पोषण के टीबी मरीज आखिर बीमारी से कैसे लड़ेंगे?
2237 मरीजों के खाते सूने, सरकार के वादे अधूरे -
जनपद में उपचाराधीन 2237 टीबी मरीज पिछले डेढ़ साल से प्रतिमाह मिलने वाले एक हजार रुपये के पोषण भत्ते का इंतजार कर रहे हैं। कई मरीज जिला मुख्यालय के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ तकनीकी समस्या का हवाला देकर लौटा दिया जाता है। आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए यह राशि इलाज के दौरान सबसे बड़ा सहारा होती है, लेकिन भुगतान बंद होने से उन्हें भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।
दवा मिली, लेकिन पोषण नहीं... इलाज पर भी संकट -
टीबी जैसी गंभीर बीमारी में मरीजों को दवा के साथ पौष्टिक भोजन की भी आवश्यकता होती है। डॉक्टर दूध, दाल, अंडा, घी, चना, मूंगफली और प्रोटीनयुक्त आहार लेने की सलाह देते हैं, लेकिन महंगाई के दौर में बिना सरकारी सहायता के यह सब खरीद पाना अधिकांश मरीजों के लिए संभव नहीं है। नतीजा यह है कि कई मरीजों की रिकवरी प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है। स्वास्थ्य विभाग के दावों के विपरीत मरीजों को केवल दवा मिल रही है, जबकि पोषण सहायता पूरी तरह ठप है।
निक्षय पोर्टल बना बहाना, मरीज भुगत रहे सजा -
राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम के तहत प्रत्येक टीबी मरीज का निक्षय पोर्टल पर पंजीकरण कर डीबीटी के माध्यम से हर माह पोषण भत्ता भेजने का प्रावधान है। लेकिन पिछले डेढ़ साल से भुगतान नहीं हुआ। विभाग का कहना है कि निक्षय पोर्टल के अपडेट और तकनीकी दिक्कतों के कारण भुगतान अटका है। सवाल यह है कि यदि समस्या तकनीकी है तो उसकी कीमत गरीब मरीज क्यों चुकाएं?
टीबी मुक्त भारत के दावों पर बड़ा सवाल -
सरकार लगातार टीबी मुक्त भारत का संकल्प दोहरा रही है, लेकिन जब इलाज करा रहे मरीजों को समय पर पोषण भत्ता ही नहीं मिल पा रहा है तो अभियान की सफलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि टीबी के इलाज में दवा के साथ पौष्टिक भोजन उतना ही जरूरी है। ऐसे में पोषण भत्ता रोकना मरीजों के स्वास्थ्य के साथ गंभीर लापरवाही माना जा रहा है।
अगले महीने भुगतान शुरू होने की उम्मीद - डीटीओ
जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ0 कीर्ति आजाद बिंद ने बताया कि "जनपद में करमा, केकराही, बभनी, चोपन, डिबुलगंज, दुद्धी, कोन, घोरावल, चतरा, नगवां समेत 11 ट्रीटमेंट यूनिट तथा 26 जांच केंद्र संचालित हैं, जिनमें 15 केंद्रों पर सीबी-नाट मशीन से जांच की सुविधा उपलब्ध है। उन्होंने स्वीकार किया कि निक्षय पोर्टल के अपडेट और तकनीकी दिक्कतों के कारण पोषण भत्ते का भुगतान प्रभावित हुआ है। उम्मीद है कि अगले महीने से लंबित भुगतान शुरू हो जाएगा।"
"टीबी जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए पोषण भत्ता कोई सरकारी उपकार नहीं, बल्कि उनके इलाज का अभिन्न हिस्सा है। यदि मरीजों को महीनों तक सहायता राशि के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें और हर बार "तकनीकी समस्या" का बहाना सुनने को मिले, तो यह व्यवस्था की गंभीर विफलता मानी जाएगी। सबसे बड़ा यह सवाल है कि जब सरकार टीबी मुक्त भारत का लक्ष्य तय कर चुकी है, तब पोषण जैसी सबसे जरूरी कड़ी ही क्यों कमजोर छोड़ दी गई? अब जरूरत सिर्फ आश्वासनों की नहीं, बल्कि लंबित पोषण भत्ते का तत्काल भुगतान सुनिश्चित करने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की है, ताकि सरकारी योजनाएं केवल कागजों तक सीमित न रहें और उनका लाभ वास्तव में जरूरतमंद मरीजों तक समय पर पहुंच सके।"




