Sonbhadra News : गंदगी के बजाय 'बजट सफाई अभियान' बना संचारी माह, कागजों में मच्छर हो रहे खत्म, हकीकत का शहरवासी झेल रहे डंक
शहर में मच्छरों ने ऐसा आतंक मचा रखा है कि अब दिन में भी लोगों का चैन छिन गया है। वहीं शाम होते ही मच्छरों का हमला और तेज हो जाता है। घर हो या दुकान, सड़क हो या सार्वजनिक स्थान कहीं भी लोगों का........

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sonbhadra
7:35 AM, August 12, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
• 40 हजार आबादी को मच्छरों के हवाले कर कागजों में ‘युद्ध’ लड़ रहा मलेरिया विभाग
• अभियान पर अभियान, दावे पर दावे….....फिर भी शहर में बढ़ता बुखार और मलेरिया का कहर
सोनभद्र । शहर में मच्छरों ने ऐसा आतंक मचा रखा है कि अब दिन में भी लोगों का चैन छिन गया है। वहीं शाम होते ही मच्छरों का हमला और तेज हो जाता है। घर हो या दुकान, सड़क हो या सार्वजनिक स्थान कहीं भी लोगों का बैठना मुश्किल है। उनसे मुक्ति दिलाने का जिम्मा मलेरिया विभाग और नगर पालिका पर है, लेकिन वह सालों से मच्छरों की जगह मक्खी मार रहा है। करीब 40 हजार की आबादी मच्छरों के सामने बेबस नजर आ रही है, लेकिन जिन विभागों के कंधों पर इस संकट से निपटने की जिम्मेदारी है, उनकी सक्रियता जमीन पर कहीं नजर नहीं आ रही।
विडंबना देखिए मच्छर बढ़ते जा रहे हैं और मलेरिया विभाग तथा नगर पालिका के अभियान मच्छरों की संख्या घटाने के दावे के साथ कागजों पर सफलता के घोड़े दौड़ रहे हैं। वर्षों से संचारी रोग नियंत्रण माह मनाया जा रहा है। आठ विभागों की संयुक्त भागीदारी के दावे होते हैं। बैठकें होती हैं, जागरूकता अभियान निकलते हैं, जिम्मेदारियों की सूची बनती है और बजट खर्च होता है। मगर शहर की गलियों में पहुंचते ही इन तमाम दावों की हकीकत नालियों के गंदे पानी और मच्छरों के झुंड में दिखाई दे जाती है।
कागजों पर समाप्त हो रहे मच्छर, हकीकत में उनका डंक झेल रहे शहरवासी -
संचारी माह का उद्देश्य मच्छरजनित बीमारियों की रोकथाम है, लेकिन शहर की स्थिति देखकर लगता है कि अभियान का असली मकसद मच्छरों को खत्म करना नहीं, बल्कि बजट की खानापूर्ति करना रह गया है। ऐसे में सवाल यह है कि यदि हर वर्ष अभियान चल रहा है, विभागों की टीमें सक्रिय हैं और संसाधनों पर खर्च हो रहा है तो फिर मच्छरों की संख्या लगातार क्यों बढ़ रही है? नालियों में पानी क्यों जमा है? जलभराव क्यों खत्म नहीं हो रहा? नियमित सफाई क्यों नहीं हो रही? फॉगिंग और कीटनाशक दवा के छिड़काव का असर आखिर दिखाई क्यों नहीं देता? आखिर यह सारा अभियान कागजों से निकलकर शहर की गलियों तक कब पहुंचेगा? क्योंकि हकीकत में मच्छर खत्म होने के बजाय लगातार बढ़ रहे हैं और उनका डंक शहरवासियों की नींद, सेहत और सुकून छीन रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि विभागों की फाइलों में मच्छर मर रहे हैं और शहर की गलियों में उनका कुनबा लगातार बढ़ रहा है?
बजबजाती नालियाँ बनी मच्छरों की 'नर्सरी', जिम्मेदारों में बाँधी आंखों पर पट्टी -
शहर के कई हिस्सों में गंदगी और जाम नालियां मच्छरों के लिए खुले प्रजनन केंद्र बन चुकी हैं। नालियों का गंदा पानी उफनकर सड़कों पर बह रहा है। जगह-जगह कूड़ा और गंदगी जमा है। सफाईकर्मियों के नियमित नहीं पहुंचने से स्थिति और खराब है।यानी एक तरफ विभाग मच्छरजनित बीमारियों से बचाव के लिए लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं और दूसरी तरफ मच्छरों को पनपने का पूरा इंतजाम खुद शहर की व्यवस्था कर रही है।
मच्छर बढ़े तो अस्पतालों में बढ़े बुखार के मरीज -
मच्छरों के बढ़ते प्रकोप का असर अब अस्पतालों में भी दिखाई देने लगा है। शहर और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग बुखार की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। मलेरिया समेत मच्छरजनित बीमारियों के मरीज और संदिग्ध मरीज सामने आ रहे हैं। बदलते मौसम और गंदगी के बीच बुखार के बढ़ते मामलों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
वहीं चिकित्सकों का कहना है कि "जलभराव और गंदगी मच्छरों के प्रजनन के लिए बेहद अनुकूल परिस्थितियां पैदा करती हैं। मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों का खतरा ऐसे माहौल में बढ़ जाता है। लोगों को मच्छरदानी का इस्तेमाल करने, घर और आसपास पानी जमा न होने देने तथा बुखार होने पर तत्काल चिकित्सकीय सलाह लेने की जरूरत है।"
अगरबत्ती और मच्छरदानी के भरोसे छोड़ दिया शहर -
हालात यह हैं कि लोग मच्छरों से बचने के लिए अगरबत्ती, कॉइल, इलेक्ट्रिक मशीन, स्प्रे और मच्छरदानी तक का सहारा ले रहे हैं, लेकिन मच्छरों का प्रकोप कम होने का नाम नहीं ले रहा। आखिर जनता कब तक अपनी जेब से मच्छरों से लड़ने के साधन खरीदती रहेगी? ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जिस काम के लिए सरकारी विभागों को जिम्मेदारी और बजट दिया गया है, उसका बोझ भी क्या अब जनता ही उठाए?




