Sonbhadra News : जब तक मौत नहीं, तब तक कार्यवाही नहीं, अवैध अस्पतालों ने खोली स्वास्थ्य विभाग के कार्यप्रणाली की पोल
आदिवासी बाहुल्य जनपद सोनभद्र में स्वास्थ्य व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल उन सैकड़ों अवैध अस्पतालों और ट्रॉमा सेंटरों ने खड़ा कर दिया है, जो खुलेआम नियम-कानून को धता बताते हुए मौत का कारोबार चला रहे......

AI जनरेटेड बैनर......
sonbhadra
4:07 PM, July 23, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । आदिवासी बाहुल्य जनपद सोनभद्र में स्वास्थ्य व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल उन सैकड़ों अवैध अस्पतालों और ट्रॉमा सेंटरों ने खड़ा कर दिया है, जो खुलेआम नियम-कानून को धता बताते हुए मौत का कारोबार चला रहे हैं। हैरत की बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे बिना पंजीकरण, बिना विशेषज्ञ चिकित्सकों और बिना आवश्यक संसाधनों के अस्पताल संचालित हो रहे हैं, लेकिन कार्यवाही तब होती है जब किसी मां की गोद उजड़ जाती है या किसी नवजात की सांस हमेशा के लिए थम जाती है।
शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक दो कमरों, किराए के मकानों और तंग गलियों में अस्पतालों का बोर्ड लगाकर मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है। कहीं प्रशिक्षित स्टाफ नर्स नहीं, कहीं लैब टेक्नीशियन नहीं और कहीं ऑपरेशन थिएटर सिर्फ नाम का है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि आयुर्वेदिक डिग्री के सहारे गंभीर मरीजों के सीजर ऑपरेशन तक किए जा रहे हैं। आखिर ऐसे लोगों को मरीजों की जिंदगी से खेलने की छूट किसने दी?
मौत के बाद जागता है स्वास्थ्य महकमा -
जिले में अवैध अस्पतालों का जाल वर्षों से फैला है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई का तरीका भी कम हैरान करने वाला नहीं है। जब तक किसी प्रसूता या नवजात की मौत नहीं होती, तब तक विभाग की टीम शायद ही किसी अस्पताल की सुध लेती है। मौत के बाद अस्पताल सील कर फोटो खिंचवा लेना और जांच बैठा देना अब विभाग की तयशुदा कार्यशैली बन चुकी है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि अस्पताल पहले से अवैध था तो वह आखिर इतने दिनों तक किसकी शह पर चलता रहा? यदि अस्पताल पंजीकृत नहीं था तो मरीज वहां तक कैसे पहुंच रहे थे? और यदि विभाग नियमित निरीक्षण करता है तो फिर ऐसे अस्पताल पकड़े क्यों नहीं जाते?
'सेटिंग-गेटिंग' के दम पर फल-फूल रहा धंधा -
जनपद में वर्षों से यह चर्चा आम है कि स्वास्थ्य विभाग की कथित "सेटिंग-गेटिंग" के चलते अवैध अस्पतालों का कारोबार फल-फूल रहा है। यही वजह है कि बिना पंजीकरण के अस्पताल खुलेआम मरीज भर्ती कर रहे हैं, बड़े-बड़े ऑपरेशन कर रहे हैं और लाखों रुपये वसूल रहे हैं।
सामान्य बीमारी को गंभीर बताकर मरीजों का आर्थिक शोषण करना इन अस्पतालों की पहचान बन चुकी है। प्रसव पीड़ा लेकर पहुंची महिलाओं को बिना पर्याप्त जांच सीधे ऑपरेशन की सलाह दे दी जाती है। कई मामलों में यही जल्दबाजी जच्चा और बच्चा दोनों की जान पर भारी पड़ जाती है।
पंजीकृत अस्पताल भी कम नहीं, केवल कागजों में होता है निरीक्षण -
स्थिति सिर्फ अवैध अस्पतालों तक सीमित नहीं है। जिले में संचालित लगभग 76 पंजीकृत निजी अस्पतालों में भी कई ऐसे हैं, जहां पंजीकरण के समय दिखाए गए डॉक्टर, सर्जन और एनेस्थेटिस्ट निरीक्षण के दौरान तक नहीं मिलते। कई अस्पतालों में ऑपरेशन ऐसे लोगों के भरोसे किए जाते हैं जिनका नाम तक पंजीकरण में दर्ज नहीं होता।
ऐसे मामलों में जब कोई बड़ी घटना होती है, तब विभाग अस्पताल सील कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है। लेकिन कुछ ही समय बाद वही संचालक नया बोर्ड, नया नाम और नया पता लेकर फिर अस्पताल खोल देते हैं। आखिर इस खेल पर स्थायी रोक क्यों नहीं लगती?
दलाल और कमीशन का पूरा नेटवर्क -
सूत्र बताते हैं कि इस पूरे खेल में दलालों और कुछ आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। मोटे कमीशन के लालच में मरीजों को सरकारी अस्पताल से बहलाकर निजी अस्पतालों तक पहुंचाया जाता है। इलाज के दौरान यदि कोई अनहोनी हो जाए तो यहीं लोग सबसे पहले गायब हो जाते हैं। यदि इस नेटवर्क की निष्पक्ष जांच हो जाए तो कई चौंकाने वाले चेहरे सामने आ सकते हैं।
एक ही महीने में दो बड़े मामले, फिर भी नहीं टूटी विभाग की कुंभकर्णी निद्रा -
पहला मामला : 14 जुलाई को रॉबर्ट्सगंज के इमरती कॉलोनी स्थित अवैध सिंह हेल्थ केयर अस्पताल में ऑपरेशन के बाद जच्चा-बच्चा की मौत हो गई। मामले में पुलिस ने अस्पताल संचालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर अग्रिम विधिक कार्यवाही में जुटी हुई है।
दूसरा मामला : चोपन के सिंदुरिया रोड स्थित बिना पंजीकरण संचालित न्यू जन सहायता हॉस्पिटल में प्रसव के दौरान नवजात की मौत हो गई। घटना के बाद डॉक्टर और स्टाफ अस्पताल छोड़कर फरार हो गए। स्वास्थ्य विभाग ने अस्पताल सील कर जांच शुरू की।
ये केवल वे मामले हैं जो मीडिया और प्रशासन के संज्ञान में आए। जानकारों की मानें तो कई मौतें अस्पतालों की चारदीवारी के भीतर ही पैसों के दम पर दबा दी जाती हैं और मामला कभी बाहर नहीं आ पाता।
अब जवाब देगा कौन -
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सोनभद्र में अवैध अस्पतालों की पहचान के लिए किसी मरीज की मौत क्यों जरूरी हो गई है? क्या स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी सिर्फ मौत के बाद अस्पताल सील करने तक सीमित है? क्या नियमित निरीक्षण केवल फाइलों तक सिमट गया है और यदि नहीं, तो फिर यह मौत का कारोबार आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है?
जब तक अवैध अस्पतालों के संचालकों, फर्जी डॉक्टरों, दलालों और उन्हें संरक्षण देने वाले जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कानूनी कार्यवाही नहीं होगी, तब तक मासूम जिंदगियां यूं ही दम तोड़ती रहेंगी और हर मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग की वहीं पुरानी कहानी दोहराई जाती रहेगी- "जांच के आदेश दे दिए गए हैं।"
क्या बोले जिम्मेदार -
वहीं सीएमओ डॉ0 रमेश कुमार मिश्रा ने बताया कि "कर्मचारियों की कमी के बावजूद लगातार अभियान चलाकर अवैध हॉस्पिटलों पर कार्यवाही भी की जा रही है और अवैध हॉस्पिटल संचालकों पर FIR की कार्यवाही भी की जा रही है, भविष्य में भी कार्यवाही जारी रहेगी।"




