"बहरहाल, केकराही में जच्चा-बच्चा की मौत जिले की कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि यह सोनभद्र की सड़ चुकी स्वास्थ्य व्यवस्था का आईना है जिसमें मरीजों की जिंदगी से ज्यादा महत्व कागजी पंजीकरण और विभागीय सांठगांठ को दिया जा रहा है। जिले में लगातार हो रही प्रसूताओं की मौतें चीख-चीखकर बता रही हैं कि स्वास्थ्य विभाग में कहीं न कहीं ऐसा "विभीषण" बैठा है, जिसके संरक्षण में मौत के ये अस्पताल बेखौफ संचालित हो रहे हैं लेकिन जिले का अधिकारी कान में तेल डालकर बैठ गए हैं। ऐसे में डीएम की कार्यवाही ने जिले में संचालित निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि अस्पताल मानकों के अनुरूप संचालित हो रहा था तो प्रसव के बाद ऐसी स्थिति क्यों बनी? अगर अस्पताल में सभी संसाधन उपलब्ध थे तो मरीज को रेफर करने की नौबत क्यों आई? और सबसे बड़ा सवाल मौत के बाद अस्पताल का पूरा स्टाफ मौके से फरार क्यों हो गया? यहीं नहीं सबसे जरूरी सवाल तो यह है कि जब जिले में पर्याप्त सर्जन और एनेस्थेटिस्ट ही नहीं हैं तो आखिर सैकड़ों निजी अस्पतालों में ऑपरेशन किसके भरोसे हो रहे हैं? क्या प्रसूताओं की जिंदगी को प्रयोगशाला बना दिया गया है? हर मौत के बाद जांच का ढोल पीटना और फिर फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल देना अब जनता समझ चुकी है। यदि इस पूरे नेटवर्क की निष्पक्ष जांच कर पंजीकरण देने वाले अधिकारियों, फर्जी मानक पूरे कराने वालों और लापरवाह अस्पताल संचालकों पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में और कितनी प्रसूताओं और मासूमों को जन्म लेने से पहले ही मौत के हवाले कर दिए जाएगा।"