Sonbhadra News : मंत्री का आदेश बेअसर, 'सुविधा' के हिसाब से तैनाती, स्वास्थ्य विभाग में अटैचमेंट का खेल जारी
एक तरफ दूरदराज के सरकारी अस्पताल जहां डॉक्टर, स्टाफ नर्स, फार्मासिस्ट और दूसरे स्वास्थ्यकर्मियों की कमी से कराह रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य विभाग के ही कुछ अस्पतालों में बड़े पैमाने पर..........

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8:33 AM, August 10, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । एक तरफ दूरदराज के सरकारी अस्पताल जहां डॉक्टर, स्टाफ नर्स, फार्मासिस्ट और दूसरे स्वास्थ्यकर्मियों की कमी से कराह रहे हैं, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य विभाग के ही कुछ अस्पतालों में बड़े पैमाने पर कर्मचारियों के अटैचमेंट की चर्चाएं सामने आ रही हैं। सवाल यह है कि जब जरूरतमंद अस्पतालों में मानव संसाधन का अभाव है तो आखिर कर्मचारियों को मूल तैनाती स्थल से हटाकर दूसरे स्थानों पर रखने की जरूरत क्यों पड़ रही है? आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? क्या अटैचमेंट अब प्रशासनिक जरूरत नहीं, बल्कि सुविधा और पहुंच का सिस्टम बन चुका है?
सूत्रों और विभागीय स्तर पर सामने आ रही जानकारी के मुताबिक जुगैल, नगवां, बभनी और म्योरपुर क्षेत्र के कई स्वास्थ्य केंद्रों में कर्मचारियों की कमी बताई जा रही है। इसके विपरीत सीएचसी चोपन, पीएचसी केकराही, अर्बन पीएचसी रॉबर्ट्सगंज, पीपीसी रॉबर्ट्सगंज और सीएचसी घोरावल में बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मियों के अटैचमेंट को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
जरूरतमंद अस्पताल खाली, पसंदीदा जगहों पर जमावड़ा क्यों -
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन अस्पतालों में मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ की जरूरत है, वहां पदस्थ कर्मचारियों को आखिर अन्य स्थानों पर क्यों लगाया गया है? यदि किसी कर्मचारी की सेवाएं किसी दूसरे संस्थान में वास्तव में आवश्यक हैं तो क्या उसके अटैचमेंट का कोई लिखित आदेश, प्रशासनिक आवश्यकता और निर्धारित अवधि है? और यदि है तो क्या इसकी नियमित समीक्षा की जा रही है?
अटैचमेंट व्यवस्था यदि वास्तविक प्रशासनिक जरूरत के बजाय सुविधा और पसंद के आधार पर चल रही है तो यह न केवल ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित कर सकती है, बल्कि विभागीय व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करती है।
ठेंगे पर स्वास्थ्य मंत्री का निर्देश, धड़ल्ले से चल रहा ‘अटैचमेंट’ का खेल -
प्रदेश सरकार लगातार सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता तथा जवाबदेही पर जोर देती रही है। उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक भी स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही और अनियमित तैनाती के मामलों में कार्रवाई के निर्देश देते रहे हैं। जनवरी 2026 में उनके निर्देश पर कई डॉक्टरों के विरुद्ध कार्रवाई और कुछ गलत मानी गई प्रतिनियुक्तियां निरस्त किए जाने की रिपोर्ट भी सामने आई थी।ऐसे में सोनभद्र में यदि अटैचमेंट के नाम पर मूल तैनाती वाले अस्पतालों से कर्मचारियों को हटाकर दूसरे संस्थानों में रखा जा रहा है तो यह जांच का विषय बन जाता है कि क्या ये सभी अटैचमेंट शासन के नियमों और सक्षम अधिकारी के आदेशों के अनुरूप हैं?
क्या अटैचमेंट की आड़ में चल रहा है ‘सुविधा का सिस्टम’ -
स्वास्थ्य विभाग में लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में तैनात कर्मचारियों को वहां काम करने के बजाय अन्य स्थानों पर अटैच कराने की व्यवस्था आखिर कैसे चलती है। यदि किसी कर्मचारी को लगातार मूल तैनाती स्थल से दूर रखा जा रहा है तो उस पद पर नियुक्ति का उद्देश्य ही सवालों के घेरे में आ जाता है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को सार्वजनिक करना चाहिए कि जनपद में कुल कितने डॉक्टर, स्टाफ नर्स, फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन, वार्ड बॉय एवं अन्य स्वास्थ्यकर्मी अटैचमेंट पर हैं, उनकी मूल तैनाती कहां है, वर्तमान तैनाती कहां है और किस अधिकारी के आदेश से उन्हें अटैच किया गया है।
गांव का मरीज भुगते, साहब की चलती रहे व्यवस्था -
सोनभद्र जैसे विशाल और भौगोलिक रूप से विषम जनपद में ग्रामीण आबादी के लिए सीएचसी और पीएचसी ही स्वास्थ्य व्यवस्था की पहली सीढ़ी हैं। ऐसे में यदि इन्हीं केंद्रों पर पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध नहीं होगा तो मरीजों को लंबी दूरी तय कर जिला अस्पताल या अन्य बड़े अस्पतालों की ओर जाना पड़ेगा। एक तरफ शासन ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने का दावा करता है, वहीं दूसरी तरफ यदि विभागीय स्तर पर ही मानव संसाधन का असमान वितरण हो रहा है तो इसका सीधा असर आम मरीज पर पड़ना स्वाभाविक है।
अब जांच से ही खुलेगा ‘अटैचमेंट’ का राज -
जरूरतमंद अस्पतालों में स्टाफ की कमी और कुछ चुनिंदा संस्थानों में अटैचमेंट की शिकायतों के बीच अब पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग उठना स्वाभाविक है। जांच में यह देखा जाना चाहिए कि प्रत्येक अटैचमेंट किस आधार पर किया गया, आदेश किस अधिकारी ने जारी किया, उसकी अवधि कितनी है और क्या मूल तैनाती स्थल पर उससे स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।




