Sonbhadra News : कजरी के थमे बोल, झूलों की थमीं पींगें...........बदल गया सोनांचल का सावन
"सावन के झूले ने मुझको बुलाया, मैं परदेसी घर वापस आया......" हिंदी फिल्म का यह गीत आज भी सावन की पुरानी यादों को ताजा कर देता है। कभी जनपद सोनभद्र में सावन का महीना शुरू होते ही गांवों की फिजाओं......

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4:55 PM, August 3, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । "सावन के झूले ने मुझको बुलाया, मैं परदेसी घर वापस आया......" हिंदी फिल्म का यह गीत आज भी सावन की पुरानी यादों को ताजा कर देता है। कभी जनपद सोनभद्र में सावन का महीना शुरू होते ही गांवों की फिजाओं में कजरी की मधुर तान गूंज उठती थी। महुआ, आम, जामुन, पीपल और बरगद के पेड़ों पर झूले पड़ते थे। नवविवाहित महिलाएं, युवतियां और बच्चे पूरे उत्साह के साथ झूले की पींगें भरते थे। लेकिन आधुनिकता और बदलती जीवनशैली की दौड़ में यह खूबसूरत लोक परंपरा अब धीरे-धीरे विलुप्त होने लगी है।
करीब डेढ़-दो दशक पहले तक सोनभद्र के ग्रामीण अंचलों-रॉबर्ट्सगंज, घोरावल, चोपन, दुद्धी, म्योरपुर, बभनी, नगवां और करमा क्षेत्र के गांवों में सावन का अलग ही रंग देखने को मिलता था। सावन लगते ही नवविवाहित महिलाएं मायके पहुंचती थीं। हाथों में गहरी मेहंदी, हरी चूड़ियां, हरी साड़ी और सोलह श्रृंगार के साथ वे समूह बनाकर बगीचों की ओर निकल पड़ती थीं। पेड़ों की मजबूत डालियों पर झूले डाले जाते थे और दिनभर कजरी, झूला गीत और सावन के लोकगीत गूंजते रहते थे। महिलाओं की हंसी-ठिठोली, बच्चों की किलकारियां और रिमझिम बारिश मिलकर पूरे गांव को उत्सव में बदल देती थीं।
सोनभद्र का प्राकृतिक सौंदर्य भी इस मौसम में चार चांद लगा देता था। चारों ओर फैली हरियाली, पहाड़ियां, जंगल, झरने और खेत-खलिहान सावन की फुहारों से और भी मनमोहक हो उठते थे। पेड़ों पर नाचते मोर, पपीहे की पुकार और कोयल की मीठी कूक वातावरण को संगीतमय बना देती थी। लेकिन अब यह दृश्य अपवाद बनकर रह गया है।
समय के साथ सोनभद्र के गांवों का सामाजिक ताना-बाना भी तेजी से बदला है। शिक्षा, नौकरी और रोजगार की तलाश में अधिकांश युवा शहरों और महानगरों की ओर पलायन कर चुके हैं। गांवों में अब बुजुर्गों की संख्या अधिक है, जबकि नई पीढ़ी मोबाइल, सोशल मीडिया और आधुनिक जीवनशैली में व्यस्त है। सामूहिक मेल-मिलाप और लोक संस्कृति की परंपराएं धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही हैं।
झूलों के गायब होने के पीछे गांवों की बदलती संरचना भी बड़ी वजह है। पहले गांवों में बड़े-बड़े बगीचे, विशाल वृक्ष और लगभग हर घर में कुएं हुआ करते थे। कुओं से पानी निकालने वाली मजबूत रस्सियां ही सावन में झूला डालने के काम आती थीं। अब न वे कुएं बचे, न वैसी रस्सियां और न ही झूला डालने लायक विशाल पेड़। बगीचों की जगह पक्के मकानों ने ले ली है, जिससे सावन के झूलों की परंपरा भी लगभग समाप्त हो गई।
आज स्थिति यह है कि पूरे जनपद में कहीं-कहीं ही बच्चों को झूला झूलते देखा जा सकता है। कजरी की स्वर लहरियां सुनाई नहीं देतीं और न ही गांवों में पहले जैसी सामूहिक रौनक दिखाई पड़ती है। सावन का महीना आज भी आता है, बारिश भी होती है, लेकिन वह आत्मीयता, वह लोक संस्कृति और वह अपनापन अब यादों का हिस्सा बनकर रह गया है।




