Sonbhadra News : निवेश की उड़ान लेकिन युवाओं को रोजगार का इंतजार! आखिर कब बदलेगी जनपद की तस्वीर
उड़ान भरने का दावा किया जा रहा है, 33 परियोजनाओं के जरिए 14,612 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव मिलने और करीब 4,068 लोगों को रोजगार मिलने की बात कही जा रही है।

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9:18 PM, September 7, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । एक तरफ जिले में 20 हजार करोड़ रुपये के निवेश की नई उड़ान भरने का दावा किया जा रहा है, 33 परियोजनाओं के जरिए 14,612 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव मिलने और करीब 4,068 लोगों को रोजगार मिलने की बात कही जा रही है। दूसरी तरफ सोनभद्र की जमीन से एक ऐसी कड़वी तस्वीर भी सामने आती रहती है, जिसे आंकड़ों और निवेश के दावों के बीच नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, रोजगार की तलाश में गैर प्रांतों का रुख करने वाले श्रमिकों के शवों का घर लौटना।
जिलाधिकारी चर्चित गौड़ की अध्यक्षता में हुई बैठक में जीबीसी 5.0 के लिए निर्धारित 20 हजार करोड़ रुपये के लक्ष्य को पूरा करने की रणनीति बनाई गई। पर्यटन, स्वास्थ्य, डेयरी, राइस मिल, पेट्रोल पंप और अन्य क्षेत्रों में निवेश के लक्ष्य तय किए गए हैं। प्रशासन का दावा है कि नए उद्योग और व्यावसायिक प्रतिष्ठान स्थापित होने से स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे।
दावा बड़ा है, लक्ष्य भी बड़ा है। लेकिन सवाल उससे भी बड़ा है—क्या इस निवेश का रास्ता सोनभद्र के उन घरों तक पहुंचेगा, जहां आज भी परिवार का पेट पालने के लिए बेटा, पति या पिता हजारों किलोमीटर दूर जाने को मजबूर है?
करोड़ों का निवेश, फिर भी बाहर जाने की मजबूरी क्यों -
सोनभद्र औद्योगिक गतिविधियों और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध जिला माना जाता है। बावजूद इसके बड़ी संख्या में स्थानीय लोग रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। बाहर कमाने गए श्रमिकों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं के बाद जब कभी उनका शव गांव पहुंचता है तो परिवार की चीख-पुकार के बीच सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि अगर जिले में रोजगार के इतने बड़े अवसर पैदा हो रहे हैं तो आखिर रोजी के लिए बाहर जाने की मजबूरी कब खत्म होगी?
सरकारी बैठकों में निवेश के करोड़ों-अरबों रुपये के आंकड़े जरूर चमकते हैं, लेकिन इन आंकड़ों का असली असर तब माना जाएगा जब सोनभद्र के युवा रोजगार के लिए दूसरे प्रदेशों की फैक्ट्रियों, निर्माण स्थलों और खतरनाक कामों का रुख करने के बजाय अपने ही जिले में काम पा सकें।
एमओयू से आगे निकलकर जमीन पर कब मिलेगा रोजगार -
जिलाधिकारी ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि निवेश प्रस्तावों को केवल एमओयू तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें धरातल पर उतारा जाए। यही निर्देश इस पूरी कवायद की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी भी है क्योंकि निवेश प्रस्ताव और वास्तविक रोजगार में जमीन-आसमान का अंतर होता है। कागज पर परियोजना, फाइल में एमओयू और बैठक में रोजगार के आंकड़े तभी मायने रखेंगे, जब धरातल पर स्थानीय हाथों को काम मिलेगा।
परिवारों को शव नहीं चाहिए रोजगार -
गैर प्रांतों में कमाने गए श्रमिकों की मौत के बाद जब उनका शव गांव पहुंचता है तो सरकारी योजनाओं, निवेश प्रस्तावों और रोजगार के दावों की चमक फीकी पड़ जाती है। पीछे रह जाता है एक परिवार, जिसकी आर्थिक रीढ़ टूट जाती है।
ऐसे में जीबीसी 5.0 का लक्ष्य केवल निवेश जुटाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। 20 हजार करोड़ रुपये का निवेश तभी सफल माना जाएगा, जब उसकी सबसे पहली प्राथमिकता सोनभद्र के स्थानीय युवाओं और श्रमिकों को सम्मानजनक, सुरक्षित और स्थायी रोजगार देना हो।
बहरहाल जनपद में निवेश की नई उड़ान का खाका तैयार है और 14,612 करोड़ रुपये के प्रस्ताव लक्ष्य की ओर बढ़ने का दावा भी किया जा रहा है। अब असली परीक्षा कागजों की नहीं, जमीन की है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि 20 हजार करोड़ रुपये के निवेश के बाद सोनभद्र के गांवों से रोजगार के लिए पलायन की तस्वीर बदलेगी या फिर गैर प्रांतों से श्रमिकों के शव लौटने का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा? आखिर स्थानीय युवाओं को अपने ही जिले में रोजगार के लिए और कितने निवेश का इंतजार करना होगा?




