सूदखोरी के इन धंधेबाजों ने बड़े कायदे से अपना जाल बुना है। पहले कर्ज लिए आदमी को खूब परेशान करते हैं, इसके बाद दूसरा सूदखोर मददगार बनकर आता है और वह ब्याज चुकाने को नया कर्ज दे देता है। उलझन में पड़ा आदमी दूसरा कर्ज लेकर पहले कर्ज का ब्याज चुकाता है। अभी वह सांस भी नहीं ले पाता, तब तक दो कर्जों का ब्याज एक साथ चुकाने का दबाव पड़ना शुरू होता है। अब यहां से उसकी व्यवस्था बिगड़ने लगती है। आय के स्रोत दुकान, खेती पर नजर गड़ाए सूदखोर वहां अपना कब्जा जमाते हैं, जिससे किस्त टूटनी शुरू होती है। इसके बाद ब्याज का ब्याज ही मूलधन से कई गुना अधिक हो जाता है और आदमी कर्जाें के इस मकड़जाल से बाहर निकलने के बाद मकान, दुकान, जमीन बेचने लगता है। कई बार इसके चक्कर में लोग इतने तनाव में आ जाते हैं कि खुद आत्मघाती कदम भी उठा लेते हैं। लेकिन, सूदखोरों पर कार्रवाई नहीं होती है।