Sonbhadra News : हाईकोर्ट की रोक से प्रशासक बने प्रधानों की बढ़ी बेचैनी, 13 जुलाई की सुनवाई पर टिकी निगाहें
इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के राज्य सरकार के फैसले पर अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद जिले की पंचायत राजनीति में हलचल तेज हो गई है। एक ओर वर्तमान ग्राम प्रधानों में..…..

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7:10 PM, June 27, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के राज्य सरकार के फैसले पर अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद जिले की पंचायत राजनीति में हलचल तेज हो गई है। एक ओर वर्तमान ग्राम प्रधानों में भविष्य को लेकर बेचैनी बढ़ गई है, वहीं पंचायत चुनाव की तैयारी में जुटे संभावित प्रत्याशियों और उनके समर्थकों में उत्साह का माहौल है। अब पूरे मामले में 13 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।
प्रशासक व्यवस्था पर असमंजस, प्रधानों में बढ़ी चिंता -
प्रधान संघ रॉबर्ट्सगंज ब्लॉक अध्यक्ष सुरेश शुक्ला ने बताया कि 26 मई को पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद सरकार ने विकास कार्यों की निरंतरता बनाए रखने के लिए ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में जिम्मेदारी सौंपी थी। लेकिन हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद प्रशासनिक स्थिति असमंजस में आ गई है। उनका कहना है कि यदि प्रशासक के रूप में कार्य करने पर रोक बनी रहती है तो गांवों के विकास कार्य प्रभावित होना तय है।
शुरू से समय पर चुनाव की मांग कर रहा है प्रधान संगठन -
अखिल भारतीय प्रधान संगठन के रॉबर्ट्सगंज ब्लॉक अध्यक्ष सुरेश शुक्ला ने कहा कि "संगठन शुरू से ही समयबद्ध पंचायत चुनाव कराने की मांग करता रहा है। उनका कहना है कि यदि तय समय पर चुनाव करा दिए गए होते तो आज यह संवैधानिक और प्रशासनिक स्थिति उत्पन्न नहीं होती। अब 13 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई के बाद पूरे मामले की तस्वीर और स्पष्ट होने की उम्मीद है।"
अधूरे विकास कार्यों पर लग सकता है ब्रेक -
ब्लॉक अध्यक्ष सुरेश शुक्ला ने कहा कि पंचायतों में सड़क, नाली, इंटरलॉकिंग, पंचायत भवन, सामुदायिक शौचालय, पेयजल योजना समेत कई विकास परियोजनाएं विभिन्न चरणों में चल रही हैं। यदि प्रशासनिक अधिकारों को लेकर जल्द स्पष्टता नहीं आई तो इन कार्यों की रफ्तार थम सकती है, जिससे ग्रामीणों को सीधा नुकसान उठाना पड़ेगा। उन्होंने सरकार से इस संबंध में शीघ्र स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की।
बीच के कार्यकाल के खर्च पर भी उठ सकते हैं सवाल -
ब्लॉक अध्यक्ष सुरेश शुक्ला ने आशंका जताई कि यदि प्रशासक के रूप में बिताया गया कार्यकाल बाद में कानूनी रूप से अमान्य माना गया तो उस अवधि में हुए खर्च और विकास कार्यों की वित्तीय वैधता पर भी सवाल उठ सकते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में भविष्य में धनराशि की वसूली जैसी कार्रवाई का डर भी प्रधानों में बना हुआ है। इसलिए सरकार को पूरे मामले में स्पष्ट दिशा-निर्देश या विस्तृत अध्यादेश जारी करना चाहिए।
संभावित प्रत्याशियों ने किया फैसले का स्वागत -
दूसरी ओर पंचायत चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे संभावित उम्मीदवारों ने हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश का स्वागत किया है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में पंचायतों का संचालन निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से ही होना चाहिए। समय पर चुनाव होना संवैधानिक व्यवस्था की मूल भावना है और इससे गांवों में जनप्रतिनिधित्व भी मजबूत होगा।
गांव-गांव में तेज हुई चुनावी सरगर्मियाँ -
हाईकोर्ट के आदेश के बाद गांवों में राजनीतिक चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। संभावित प्रत्याशी अपने समर्थकों के साथ बैठकें कर चुनावी रणनीति बनाने में जुट गए हैं। पंचायत चुनाव की संभावनाओं को देखते हुए कई गांवों में सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियां भी बढ़ गई हैं।
13 जुलाई की सुनवाई को माना जा रहा निर्णायक -
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 243-ई के अनुसार पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष का निश्चित है और इसकी अवधि समाप्त होने से पहले नए चुनाव कराना अनिवार्य है। न्यायालय ने यह भी कहा कि सरकार किसी अध्यादेश या कानून के माध्यम से पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष से आगे नहीं बढ़ा सकती। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने प्रथम दृष्टया सरकारी आदेशों को संविधान की भावना के विपरीत मानते हुए ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में पद पर बनाए रखने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। ऐसे में अब पूरे प्रदेश के ग्राम प्रधानों, संभावित प्रत्याशियों और ग्रामीणों की नजरें 13 जुलाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। माना जा रहा है कि यदि राज्य सरकार अदालत के समक्ष संतोषजनक पक्ष नहीं रख पाती है तो पंचायतों के प्रशासनिक संचालन और चुनाव प्रक्रिया को लेकर बड़ा फैसला सामने आ सकता है, जिसका असर प्रदेश की सभी ग्राम पंचायतों पर पड़ेगा।




