Sonbhadra News : सोनांचल की नदियों के घाटों पर गूंजेंगी आरती... लेकिन खनन माफियाओं पर कब होगी कार्यवाही
प्रदेश सरकार ने नदियों के संरक्षण और जनजागरूकता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से गंगा आरती की तर्ज पर अब सोनांचल की प्रमुख नदियों के घाटों पर नियमित आरती कराने की तैयारी शुरू कर दी है....................

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7:08 PM, July 27, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । प्रदेश सरकार ने नदियों के संरक्षण और जनजागरूकता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से गंगा आरती की तर्ज पर अब सोनांचल की प्रमुख नदियों के घाटों पर नियमित आरती कराने की तैयारी शुरू कर दी है। सोन, रेणुका, कनहर, कर्मनाशा और बेलन जैसी नदियों के घाटों पर पुजारियों की तैनाती कर धार्मिक आयोजन के माध्यम से लोगों को नदी संरक्षण से जोड़ने की योजना बनाई गई है। लेकिन इस पहल के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब नदियां आज भी अवैध खनन, औद्योगिक प्रदूषण और प्रशासनिक लापरवाही की मार झेल रही हैं, तब केवल आरती से हालात कितने बदल पाएंगे?
जिले में नदियाँ वर्षों से झेल रही हैं अवैध खनन का दंश -
सोनभद्र की नदियां वर्षों से अवैध खनन का दंश झेल रही हैं। कई स्थानों पर नियमों को ताक पर रखकर मशीनों से खनन किए जाने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। खनन से नदी की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हुई है और गहरे गड्ढे बन गए हैं। हाल ही में सोन नदी में ऐसे ही गहरे गड्ढों में डूबने से दो मासूम बच्चों की मौत हो गई थी। इसके बावजूद अवैध खनन पर प्रभावी और स्थायी कार्यवाही देखने को नहीं मिली। वहीं क्षेत्र के कई औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर भी समय-समय पर नदियों में अपशिष्ट छोड़ने के आरोप लगते रहे हैं, जिससे नदी का जल और पर्यावरण दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
सभी नगर निकायों और विकास खंडों से मांगा गया है रिपोर्ट -
इसी बीच राज्य स्वच्छ गंगा मिशन के निर्देश पर जिला गंगा समिति ने प्रमुख नदी घाटों पर नियमित आरती शुरू कराने की प्रक्रिया तेज कर दी है। जारी निर्देश के अनुसार प्रत्येक घाट पर एक-एक पुजारी की नियुक्ति की जाएगी। ऐसे लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी जो नमामि गंगे, नदी संरक्षण, स्वच्छता और जनजागरूकता अभियानों से जुड़े हों या भविष्य में सक्रिय योगदान देने के इच्छुक हों। चयनित पुजारियों को विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाएगा और संबंधित नगरीय निकायों एवं विकास खंडों से रिपोर्ट भी मांगी गई है।
सरकार का उद्देश्य धार्मिक आस्था के माध्यम से लोगों को नदी संरक्षण से जोड़ना और जनभागीदारी बढ़ाना है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि जनजागरूकता किसी भी संरक्षण अभियान की महत्वपूर्ण कड़ी होती है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि इसके साथ अवैध खनन, प्रदूषण, अतिक्रमण और औद्योगिक अपशिष्ट पर प्रभावी कार्यवाही नहीं हुई तो केवल आरती से नदियों की सेहत में अपेक्षित सुधार संभव नहीं होगा।
जारी पत्र की कई बातें भी बनीं चर्चा का विषय -
नदी आरती को लेकर जारी पत्र की कुछ बातें भी सवालों के घेरे में हैं। स्थानीय परंपराओं और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सोन नदी को 'नद' अर्थात पुरुष स्वरूप माना जाता है, जबकि पत्र में उसकी आरती कराने का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा पत्र में छठ पर्व के दौरान पुजारियों द्वारा पूजा संपन्न कराने का उल्लेख है, जबकि छठ लोक आस्था का ऐसा पर्व है जिसमें व्रती स्वयं पूजा-अर्चना करते हैं और पारंपरिक रूप से पुजारियों की कोई भूमिका नहीं होती। इससे यह चर्चा शुरू हो गई है कि योजना तैयार करते समय स्थानीय धार्मिक परंपराओं और सामाजिक तथ्यों का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया।
धार्मिक पहल के साथ ठोस कार्यवाही की भी अपेक्षा -
नदी संरक्षण से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि सरकार धार्मिक आस्था को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की इस पहल के साथ-साथ अवैध खनन पर कठोर कार्रवाई, औद्योगिक प्रदूषण की नियमित निगरानी, नदी तटों की सफाई और जल गुणवत्ता सुधारने के ठोस उपाय भी सुनिश्चित करे, तो यह अभियान वास्तव में सार्थक साबित हो सकता है। अन्यथा यह आशंका बनी रहेगी कि नदी की वास्तविक समस्याएं जस की तस रहें और प्रयास केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाएं।




