"बहरहाल शाहगंज और रॉबर्ट्सगंज में करंट की चपेट में आए दोनों निविदा लाइनमैन इस समय जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल सिर्फ इन हादसों का नहीं, बल्कि उन हालातों का है जो हर बार एक जैसी तस्वीर पेश करते हैं। जब कोई लाइनमैन अपनी जान जोखिम में डालकर बिजली व्यवस्था बहाल करता है, तब वह विभाग के लिए सबसे अहम कर्मचारी होता है, लेकिन हादसा होते ही वहीं कर्मचारी मानों विभाग के लिए बोझ बन जाता है। जिस वक्त घायल कर्मचारी को अपने विभाग के सहयोग, संवेदना और जिम्मेदार अधिकारियों की मौजूदगी की सबसे अधिक जरूरत होती है, उसी वक्त उसे अस्पताल के बिस्तर पर अपने हाल पर छोड़ दिए जाने के आरोप सामने आते हैं। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के मर जाने का भी प्रमाण है।"