Sawan News : सावन में "झूले के संग सावनी गीत" बनते जा रहे इतिहास
सावन में "झूले के संग सावनी गीत" बनते जा रहे इतिहास

sonbhadra
8:37 AM, August 3, 2024
धर्मेन्द्र गुप्ता (संवाददाता)
सोनभद्र। वर्षा ऋतु के रिमझिम बारिस का सावन का महीना फुहारों के बीच हरियाली समेटे अपने उफान पर है।समय बदलने के साथ प्राणियों की व्यस्तता बढ़ने लगी है।आज का मानव इस कदर व्यस्त हो गया है कि पर्व,त्योहारों का कद्र देखने को नही मिलता है। एक समय होता था जब सावन माह के आरंभ होते ही घर के आंगन में लगे पेड़ पर झूले पड़ जाते थे और महिलाएं गीतों के साथ उसका आनंद उठाती थीं। आज लोगों को पेड़ों से दूरियां बढ़ गई।समय के साथ पेड़ गायब होते गए और कच्चे खपरैल के मकान के स्थान पर पक्के मकान के बनने से आंगन का अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया। ऐसे में सावन के झूले भी इतिहास बनकर हमारी परंपरा से गायब हो रहे हैं।
अब सावन माह में झूले कुछ जगहों पर ही दिखाई देते हैं। जन्माष्टमी के पर्व पर मंदिरों में सावन की एकादशी के दिन भगवान को झूला झुलाने की परंपरा अभी निभाई जा रही है। पुराने दिनों गांवों में महिलाओं की टोली रस्सियों की सहायता से पेड़ों की डालियों में झूला डालकर दिनभर झूलती थी। शाम ढलने पर महिलाओं की टोलियां पारंपरिक सावनी गीत गाते हुये अपने घरों को जाती थीं।
नव बिवाहित युवतियों को शादी के बाद सावन मास का इन्तजार रहता था वहीँ तीज त्योहारों के आगमन से नव नवेली दुल्हन स्वयं को यौवन की पूर्णता एवं अपने सखियों संघ मिल बैठ अपने बीते पलों से रु बरु होती थी।
सावन माह के त्योहार के नजदीक आते ही बहन बेटियां ससुराल से मायके बुला ली जाती थी और वह आम के बगीचों में झूला डाल कर झूलतीं थीं । झुंड के रुप में दर्जनों महिलायें इकट्ठा होकर सावन के गीत गाया करतीं थीं ।
सावन के दिनों की ऐसी मनमोहक पल तथा गांव-गांव नजर आने वाले झूले अब लगभग विलुप्त से होते जा रहे हैं।




