“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में" - बशीर बद्र
प्रसिद्ध उर्दू शायर और पद्मश्री सम्मानित डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार को भोपाल में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे।

bhopal
4:07 PM, May 29, 2026
प्रसिद्ध उर्दू शायर और पद्मश्री सम्मानित डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार को भोपाल में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे।
बशीर बद्र साहब लंबे समय से डिमेंशिया (Dementia) जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। इस बीमारी के चलते उनकी याददाश्त बहुत कमज़ोर हो गई थी। उन्हें लोगों को पहचानने में भी दिक़्क़त आ रही थी । इसी वजह से बशीर साहब ने शायरी का साथ बहुत पहले छोड़ दिया था।
बशीर बद्र का पूरा नाम सय्यद मुहम्मद बशीर था. उनका जन्म 15 फरवरी 1935 को कानपुर में हुआ। उन्होंने शुरुआती तालीम कानपुर से हासिल की. कम उम्र में ही पुलिस की नौकरी भी की। महज 20 साल की उम्र से ही उनकी ग़ज़लें हिंदुस्तान और पाकिस्तान की अवाम तक पहुंचने लगी थीं । उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और वे मेरठ यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग के लेक्चरर भी रहे।
बशीर बद्र की ख्याति विदेशों तक फैली थी। उन्होंने उस दौर के व्यवस्थाओं पर कई शायरियाँ लिखी, जिनमें एक यह बेहद मशहूर हुई।
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में ।”
वशीर साहब की शायरी में ऐसी कशिश थी कि लोग वाह - वाह करते नहीं थकते थे। उन्ही में एक यह भी था।
न जी भर के देखा न कुछ बात की, बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी, किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए




