Sonbhadra News : सोनभद्र के इस इलाके में आखिर आदिवासी क्यों पहले मनाते हैं होली
आदिवासी बाहुल्य विंढमगंज थाना क्षेत्र के झारखंड व छत्तीसगढ़ के बॉर्डर पर स्थित बैरखड़़ गांव है जहां पर होली मनाने की अलग और अति प्राचीन परंपरा है।

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9:56 PM, March 10, 2025
धर्मेंद्र गुप्ता (संवाददाता)
■ आज जमकर खेली गई होली
विंढमगंज (सोनभद्र) । भारत ही एक देश है जहां अनेक सभ्यता एवं संस्कृति के लोग रहते हैं। इसमें विविधताओं के असंख्य स्वरूप हैं। उसके अपने मायने हैं। अपनी विशेषता है और खूबसूरती है। इसीलिए तो जनपद के आदिवासी बाहुल्य विंढमगंज थाना क्षेत्र के झारखंड व छत्तीसगढ़ के बॉर्डर पर स्थित बैरखड़़ गांव है जहां पर होली मनाने की अलग और अति प्राचीन परंपरा है। इसके वर्तमान स्वरूप में अत्यंत प्राचीन काल की संस्कृति की झलक दिखाई पड़ती है।
प्रायः ऐसी मान्यता है कि बैरखड़ गांव के आदिवासी 5 दिन पहले यानी बीती रविवार की रात्रि को होलिका दहन तथा आज सोमवार को होली का त्योहार आदिवासी परम्परा के अनुसार मना रहे हैं। होली मनाने की परम्परा को लेकर निर्वतमान ग्राम प्रधान उदय पाल कहते हैं कि गांव में जिन्दा होली मनाने की परम्परा काफी पुरानी है । गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि बहुत पहले एक बार गांव में भारी धन जन की क्षति हुई थी और गांव महामारी जैसी स्थिति हो गई थी।गांव के लोग काफी परेशान थे तब उसका निदान ढूंढने के लिए आदिवासियों ने काफी पहल किया।उस समय आदिवासी समुदाय के बुजुर्ग लोगो एवं बैगा ने चार - पांच दिन पहले होली मनाने का सुझाव दिया था तभी से बैरखड़ गांव में जिंदा होली मनाने की परंपरा चल पड़ी जिसे आदिवासी समाज आज भी संजोए हुए हैं।गांव के लोग बताते हैं कि गांव में सुख समृद्धि बनी रहती हैं।
मानर की धुन पर झूमें पुरूष और महिलाएं-
थाना क्षेत्र के बैरखड़ जैसे आदिवासी बाहुल्य गांवों में मानर की थाप पर होली खेलने की परम्परा आज भी कायम है।बैरखड़ गांव आदिवासी जनजाति बाहुल्य गांव हैं ।यहां के निवासी हर त्योहार अपने परम्परा एवं रीति रिवाज के अनुसार मनाते हैं।वैसे भी इस जनजाति का इतिहास प्राचीन काल तक जाता है। ये लोग समूह में इकट्ठा होकर एक-दूसरे को अबीर लगाते है और मानर नामक वाद्ययंत्र की धुन पर नृत्य करते हैं। इस नृत्य में महिलाएं भी शामिल रहती हैं।




