Sonbhadra News : स्नातक एमएलसी चुनाव में 56% मतदान के क्या हैं राजनीतिक मायने ? फायदा या नुकसान ?
स्नातक एमएलसी चुनाव: दुद्धी में 56% मतदान के क्या हैं राजनीतिक मायने ? स्नातकों की बेरुखी पर चर्चाओं का बाजार गर्म

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7:03 PM, October 24, 2026
स्नातकों की बेरुखी पर चर्चाओं का बाजार गर्म
आर के सिंह (संवाददाता )
दुद्धी (सोनभद्र)। प्रदेश में संपन्न हुए स्नातक एमएलसी (विधान परिषद) चुनाव के बाद अब हार-जीत के गणित को लेकर राजनीतिक गलियारों और चौपालों पर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। सोनभद्र जनपद के दुद्धी विधानसभा मुख्यालय पर इस बार 56 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं। इस औसत मतदान ने जहां दिग्गजों की धड़कनें बढ़ा दी हैं, वहीं 'किसे फायदा और किसे नुकसान' होगा, इसे लेकर कयासबाजी का दौर शुरू हो चुका है।दुद्धी मुख्यालय पर हुआ 56 प्रतिशत मतदान चुनावी विश्लेषकों के लिए एक पहेली बन गया है। न तो इसे बंपर वोटिंग की श्रेणी में रखा जा सकता है और न ही इसे पूरी तरह से निराशाजनक कहा जा सकता है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, जब मतदान का प्रतिशत औसत रहता है, तो इसका सीधा मतलब होता है कि राजनीतिक दलों का 'कैडर आधारित पारंपरिक वोट बैंक' तो पोलिंग बूथ तक पहुंचा, लेकिन आम या निष्पक्ष मतदाता घरों से बाहर निकलने में उदासीन रहा।
इस औसत मतदान के बाद मुख्य मुकाबला आमने-सामने की लड़ाई में तब्दील हो चुका है। सत्ताधारी दल और उनके समर्थकों का मानना है कि उनका मजबूत संगठनात्मक ढांचा और पन्ना प्रमुख स्तर का नेटवर्क सक्रिय था। उनके अनुसार, औसत मतदान का मतलब है कि उनका प्रतिबद्ध वोटर चुपचाप बूथ पर जाकर वोट दे आया है, जो उनकी जीत सुनिश्चित करेगा। दूसरी ओर, विपक्ष इस 56 फीसदी मतदान को अपने पक्ष में देख रहा है। विपक्ष का तर्क है कि सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इंकंबेंसी) के कारण 'साइलेंट वोटर' ने चुपचाप बदलाव के लिए मतदान किया है। विपक्ष को उम्मीद है कि युवाओं की नाराजगी उनके पक्ष में जाएगी।
शिक्षकों की अपेक्षा स्नातकों ने क्यों दिखाई चुनाव में बेरुखी ?
इस चुनाव में सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह उठ रहा है कि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के मुकाबले स्नातक मतदाताओं ने वोटिंग में उतनी रुचि क्यों नहीं दिखाई? जागरूक, उच्च शिक्षित और क्षेत्र की दशा-दिशा तय करने वाले स्नातकों का कम संख्या में बूथों पर पहुंचना क्षेत्र में गहरी चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थानीय प्रबुद्ध वर्ग और बुद्धिजीवियों का स्पष्ट आरोप है कि राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों ने आम स्नातक मतदाताओं से उस स्तर पर सम्पर्क (डोर-टू-डोर कैंपेन) नहीं किया, जैसा आम तौर पर विधानसभा या त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में देखा जाता है। अधिकांश प्रत्याशी केवल चुनिंदा रसूखदारों, प्रभावशाली चेहरों और सोशल मीडिया कैंपेन के भरोसे ही चुनावी नैय्या पार लगाने की जुगत में दिखे। आम मतदाता तक पर्ची और वोटिंग की सही जानकारी समय पर नहीं पहुंच सकी।
चौपालों से लेकर दफ्तरों तक हार-जीत के गुणा-भाग का दौर शुरू-
सोनभद्र के इस सुदूरवर्ती और आदिवासी बहुल अंचल दुद्धी में मतदान संपन्न होने के बाद अब मतपेटियां सील हो चुकी हैं। फिलहाल, तहसील परिसर, ब्लॉक मुख्यालयों, चौक-चौराहों, चाय की दुकानों और दफ्तरों में हर कोई अपनी-अपनी सहूलियत और पसंद के हिसाब से हार-जीत के आंकड़े फिट करने में जुटा है। यह 56 प्रतिशत का औसत मतदान किस प्रत्याशी के लिए संजीवनी बनेगा और किसका खेल बिगाड़ेगा, यह तो मतगणना के बाद आने वाले आधिकारिक परिणाम ही साफ करेंगे।




