Sonbhadra News : टॉक्सिकोलॉजिकल लैब की मांग को लेकर ग्रामीणों ने जिलाधिकारी को सौंपा ज्ञापन
औद्योगिक प्रदूषण से जूझ रहे सोनभद्र के दक्षिणांचल क्षेत्र के लोगों ने एक बार फिर स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा का मुद्दा उठाया है। सिंगरौली प्रदूषण मुक्ति वाहिनी के नेतृत्व में ग्रामीणों ने.....

टॉक्सिकोलॉजिकल लैब की मांग को लेकर प्रदर्शन करते दक्षिणांचल के ग्रामीण.....
sonbhadra
7:36 PM, June 5, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
• 30 वर्षों से औद्योगिक प्रदूषण की मार झेल रहा दक्षिणांचल
• सांस, कैंसर, किडनी और मानसिक रोगों के शिकार बन रहे स्थानीय निवासी
सोनभद्र । औद्योगिक प्रदूषण से जूझ रहे सोनभद्र के दक्षिणांचल क्षेत्र के लोगों ने एक बार फिर स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षा का मुद्दा उठाया है। सिंगरौली प्रदूषण मुक्ति वाहिनी के नेतृत्व में ग्रामीणों ने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर क्षेत्र में तत्काल टॉक्सिकोलॉजिकल लैब स्थापित करने, प्रदूषण जनित बीमारियों की जांच एवं उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित करने तथा प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की।
इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि म्योरपुर, बभनी, दुद्धी, कोन और चोपन ब्लॉकों के 300 से अधिक गांव पिछले तीन दशकों से औद्योगिक प्रदूषण की गंभीर मार झेल रहे हैं। क्षेत्र की हवा और पानी में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण का असर अब लोगों के स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार और आने वाली पीढ़ियों तक पर दिखाई देने लगा है।
सांस की बीमारी से लेकर कैंसर तक बढ़ रहा खतरा -
ग्रामीणों ने दावा किया कि वर्ष 2012 में 52 गांवों के लगभग 21 हजार लोगों की जांच में फेफड़ों की औसत क्षमता केवल 58 प्रतिशत पाई गई थी। वहीं हाल के शोधों में क्षेत्र के बड़ी संख्या में लोगों में दमा, श्वास रोग, किडनी संबंधी बीमारी, मधुमेह, कैंसर, मानसिक रोग और हड्डियों की समस्याएं सामने आई हैं।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि महिलाओं में गर्भपात की घटनाएं प्रदेश के औसत से कहीं अधिक हैं, जबकि बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर भी प्रदूषण का गंभीर प्रभाव देखा जा रहा है। लोगों का आरोप है कि क्षेत्र में गंभीर बीमारियों की पहचान और उपचार के लिए आवश्यक जांच सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं।
खतरे में आने वाली पीढ़ी -
संगठन ने दावा किया कि हाल के अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि प्रदूषण के कारण बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास की गति प्रभावित हो रही है। सामान्य विकास मानकों की तुलना में बड़ी संख्या में बच्चे चलने, बोलने और पहचानने जैसी बुनियादी गतिविधियों में भी विलंब का सामना कर रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां गंभीर स्वास्थ्य संकट का सामना करेंगी।
एनजीटी के आदेशों का हवाला -
ज्ञापन में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के वर्ष 2018 के आदेश का हवाला देते हुए कहा गया कि प्रदूषण प्रभावित क्षेत्र में टॉक्सिकोलॉजिकल लैब की स्थापना और चिकित्सकों के विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता पर पहले ही बल दिया जा चुका है। इसके बावजूद अब तक इस दिशा में ठोस प्रगति नहीं हो सकी है।
संगठन ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में प्रदूषण की निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है, जबकि कई स्थानों पर प्रदूषित पानी के नालों और ऐश पॉन्ड से निकलने वाले अवशेष जल स्रोतों को प्रभावित कर रहे हैं।
उठाई गईं पांच प्रमुख मांगें -
ग्रामीणों और संगठन के प्रतिनिधियों ने जिलाधिकारी के माध्यम से शासन से पांच प्रमुख मांगें कीं -
- दक्षिणांचल में तत्काल टॉक्सिकोलॉजिकल लैब की स्थापना।
- डॉक्टरों को प्रदूषण जनित बीमारियों की पहचान और उपचार के लिए विशेष प्रशिक्षण।
- हवा और पेयजल की गुणवत्ता जांच के लिए अधिक निगरानी केंद्रों की स्थापना।
- मानक से अधिक प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर दंडात्मक कार्रवाई।
- प्रदूषण नियंत्रण निगरानी दल का गठन, जिसमें सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाए।
इलाज के लिए बिक रही जमीन-जायदाद -
ज्ञापन में कहा गया कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे कई परिवार इलाज के लिए अपनी जमीन-जायदाद बेचने को मजबूर हैं, लेकिन इसके बावजूद मरीजों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि प्रदूषण और स्वास्थ्य संकट के मुद्दे पर शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो व्यापक जनआंदोलन शुरू किया जाएगा।
ये रहे मौजूद -
इस दौरान रामेश्वर प्रसाद, ग्राम प्रधान दिनेश, मनोज कुमार, उमेश चौबे, रमेश यादव, रामनारायण, कृष्णा, बेचन, अधिक विश्वनाथ, शिवशरण, मान सिंह, बेचू, हीरा मति, प्रेम कुमारी, पार्वती, विशंभर खरवार समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।




