Sonbhadra News : आजादी के 78वर्ष बाद भी एक सड़क को तरस रहा ये गाँव
आजादी के बाद से देश और उत्तर प्रदेश पूरी तरह बदल चुका है, हर तरफ विकास की बयार बहने के दावे हो रहे हैं लेकिन जनपद सोनभद्र के एक गांव की किस्मत आज तक नहीं बदली है। आजादी से अब तक कितनी सरकारें बनीं....

पक्की सड़क की मांग को लेकर कलेक्टर पर प्रदर्शन करते नई और भरहिया ग्राम पंचायत के ग्रामीण.....
sonbhadra
9:35 PM, August 12, 2025
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । आजादी के बाद से देश और उत्तर प्रदेश पूरी तरह बदल चुका है, हर तरफ विकास की बयार बहने के दावे हो रहे हैं लेकिन जनपद सोनभद्र के एक गांव की किस्मत आज तक नहीं बदली है। आजादी से अब तक कितनी सरकारें बनीं लेकिन जनपद मुख्यालय से छः किमी दूर ग्राम पंचायत नई और भरहिया में सड़क नहीं बन पाई है। हर चुनाव से पहले नेता सड़क बनाने के वादे करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही भूल जाते है, जिसकी वजह से जहाँ बच्चों को विद्यालय जाने में दिक्क़तों को सामना करना पड़ता है वहीं गंभीर मरीजों को अपनी जान भी गँवानी पड़ती है। आज दोनों ग्राम पंचायतों के सैकड़ों की संख्या में कलेक्ट्रेट पहुँचे ग्रामीणों ने प्रदर्शन कर पक्की सड़क निर्माण की मांग की।
सड़क नहीं होने से रेंग रहा गाँव का विकास -
जिला और ब्लॉक मुख्यालय रॉबर्ट्सगंज से करीब छः किमी की दूरी पर स्थित ग्राम पंचायत नई और भरहिया की आबादी करीब तीन हजार है। आजादी के बाद आज तक सड़क बनवाने की कोई पहल नहीं की गई। ग्रामीणों ने बताया कि चुनाव में वोट मांगने के लिए आने वाले नेताओं ने सड़क बनवाने का आश्वासन देकर वोट तो ले लिया लेकिन बाद में इस गांव की ओर मुड़कर नहीं देखा। बरसात के दिनों में इस सड़क पर वाहन तो दूर पैदल निकलना भी मुश्किल हो जाता है। इस दौरान यदि कोई बीमार हो जाए या महिला को प्रसव के लिए अस्पताल ले जाना पड़े तो चारपाई पर लेकर जाना पड़ता है, जिससे मरीज ग्रामीणों ने डीएम से गांव की करीब दो किमी लंबी खस्ताहाल सड़क को बनवाने की मांग की है। गांव तक पक्की सड़क नहीं होने से आवागमन में परेशानी होती है। बरसात में दिक्कतें और बढ़ जाती हैं। सड़क नहीं होने की वजह से गांव का विकास रेंग रहा है। विडंबना यह कि जनप्रतिनिधि इससे बेखबर-बेपरवाही में हैं।
कच्ची सड़क बनी दलदल, मर रहे मरीज -
ग्रामीणों ने बताया कि "गांव के ग्रामीण हर स्तर पर सड़क बनवाने की मांग कर चुके हैं, लेकिन हमेशा निराशा ही मिलती है। जनप्रतिनिधि, जिम्मेदार अधिकारी आज तक सड़क नहीं बना सके। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा बरसात के समय में उठाना पड़ता है, क्योंकि बारिश के बाद कच्ची सड़क कीचड़ में तब्दील हो गई है, जिसमें गिरते पड़ते बच्चे और शिक्षक स्कूल पहुंचते हैं। वहीं, कोई बीमार पड़ जाए तो उसे अस्पताल ले जाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। अभी तीन दिन पूर्व ही एक मरीज बीमार था और एम्बुलेंस गाँव में नहीं पहुँच पायी और मरीज को खाट पर लाद कर एम्बुलेंस तक पहुँचाते पहुंचाते मरीज ने दम तोड़ दिया। यहीं नहीं मरने के बाद श्मशान जाते मुर्दे को कीचड़ भरे रास्ते से गिरते-पड़ते गुजरना पड़ता है। इस बार ग्रामीणों ने एकजुट होकर पंचायत चुनाव का बहिष्कार करने का मन बनाया है। वहीं, गांव में स्थित स्कूल के शिक्षकों ने भी वर्षों से बरसात के समय कीचड़ भरे रास्ते से गुजर कर स्कूल पहुंचने की समस्या से निजात पाने के लिए सरकार से मांग की है।"




