इस हादसे ने ट्रैफिक व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी। इतनी महत्वपूर्ण स्थान जहाँ कलेक्ट्रेट, विकास भवन के अलावा जिलाधिकारी आवास व पुलिस अधीक्षक का आवास है, चंद कदमों की दूरी पर जिला अस्पताल हो, उससे थोड़ी दूर एआरटीओ कार्यालय भी मौजूद हो । इसके अलावा तमाम प्राइवेट अस्पताल भी घटनास्थल से कुछ दूरी पर मौजूद हैं, इसके बावजूद वहां पर पुलिस ट्रैफिक व्यवस्था की तैनाती कलेक्ट्रेट मुख्य द्वार के नीचे खड़े रहते हैं जो किसी भी दृष्टिकोण से उपयोगी नहीं है। हां इतना जरूर है कि आला अफसरों को आते-जाते सलामी जरूर मिल जाती है । लेकिन जनहित में कोई फायदा नहीं। लोगों का कहना है कि यदि डिवाइडर पर एक ट्रैफिक बूथ बनाकर एक पुलिस कर्मी की तैनाती कर दी जाय तो भविष्य में इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति नहीं होगी । क्योंकि जिस स्थान पर घटना घटित हुआ है वहां हर दिन सैकड़ो की संख्या में ग्रामीण अंचलों के लोग अपने काम को लेकर कलेक्ट्रेट व विकास भवन आते-जाते हैं । ऐसे में यदि वहां ट्रैफिक व्यवस्था दुरुस्तन नहीं की गई तो भविष्य में इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति हो सकती है और एक बार फिर एक परिवार उजड़ सकता है।