"बहरहाल, सरकार बेटियों को गंभीर बीमारियों से बचाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर जागरूकता अभियान चला रही है, लेकिन जिले में पांच माह में महज 11 प्रतिशत लक्ष्य पूरा होना कई सवाल खड़े करता है। यदि स्वास्थ्य विभाग का जनजागरूकता अभियान वास्तव में प्रभावी होता, तो हजारों किशोरियां अब तक इस जीवनरक्षक वैक्सीन से वंचित नहीं रहतीं। आखिर अभियान की धीमी रफ्तार का जिम्मेदार कौन है- जागरूकता की कमी, विभागीय सुस्ती या फिर जमीनी स्तर पर कमजोर मॉनिटरिंग? जब सर्वाइकल कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से बचाव का प्रभावी टीका उपलब्ध है, तब क्या स्वास्थ्य विभाग केवल बैठकों और आंकड़ों तक ही सीमित रहेगा, या फिर समय रहते अभियान को मिशन मोड में चलाकर हर पात्र किशोरी तक यह सुरक्षा कवच पहुंचाने की जवाबदेही भी निभाएगा? ऐसे में अब देखने वाली बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग इन सवाल का जवाब में कागजी आंकड़े दिखाता है या फिर जिम्मेदार अधिकारी बंद कमरों और बंद गाड़ियों से बाहर निकल कर अभियान को गति देने में अपनी भूमिका निभाते हैं।"