Sonbhadra News : शहर से गांव तक ऑनलाइन गेम का जाल, जान गवाँ रहे युवा
गाजियाबाद जनपद में कोरियन गेम की लत का शिकार हुई तीन बहनों की खिड़की से कूदकर जान देने के बाद युवाओं में बढ़ती ऑनलाइन गेम की लत पर रोक लगाने को लेकर बहस तेज हो गई है। गाजियाबाद की इस घटना ने पूरे....

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sonbhadra
6:17 PM, February 6, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
• आसान टास्क से शुरुआत, धीरे-धीरे बढ़ता मानसिक दबाव, रिवॉर्ड-दंड सिस्टम से खिलाड़ी को बांधने की रणनीति
• किसी को मत बताओ जैसी शर्तों से आइसोलेशन, नींद, पढ़ाई और सोशल लाइफ पर भी पड़ रहा सीधा असर
सोनभद्र । गाजियाबाद जनपद में कोरियन गेम की लत का शिकार हुई तीन बहनों की खिड़की से कूदकर जान देने के बाद युवाओं में बढ़ती ऑनलाइन गेम की लत पर रोक लगाने को लेकर बहस तेज हो गई है। गाजियाबाद की इस घटना ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। सच्चाई यह है कि यह किसी एक शहर या परिवार की समस्या नहीं रह गई है। जनपद सोनभद्र में भी ऐसे ही एक मामले में बलिया निवासी पॉलिटेक्निक के छात्र ने खुदकुशी कर लिया था। वहीं सोनभद्र में अब तक ऐसे मामले भले ही कम उजागर हुए हैं, लेकिन गांव से शहर तक इसका जाल फैला हुआ है, जिससे इंकार नहीं किया जा सकता। फोन पर पाबंदी, गेम खेलने से मना करने या फिर स्मार्ट फोन खरीद की जिद पूरी न होने पर जिंदगी दांव पर लगाने से भी नहीं हिचक रहे हैं। मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग में हर माह करीब पांच-छह मामले ऐसे मामले आ रहे हैं, जिसमें मोबाइल गेम की लत का शिकार हुए बच्चों को अभिभावक लेकर पहुंच रहे हैं, जहां दवा-इलाज के साथ उनकी लंबी काउंसिलिंग करनी पड़ रही है।
बच्चों व युवाओं के दिल और दिमाग दोनों पर असर कर रही है डिजिटल दुनियाँ -
डिजिटल की दुनिया दिल और दिमाग पर दोनों पर गहरा असर कर चुकी है। खास करके जेन-जी पर इसका नशा हावी है। परिवार से ज्यादा वह डिजिटल गेम और मोबाइल फाेन महत्व दे रहे हैं। कमोबेश हालात यह है कि अगर अभिभावकों की फोन से दूरी बनाने का दबाव बनाते हैं या डांटते-फटकारते हैं तो ऐसी स्थिति में यह किशोर अपनी जिंदगी को दांव पर लगा ले रहे हैं। मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग में इन दिनों औसतन चार से पांच मामले ऐसे पहुंच रहे हैं, जिसमें अभिभावक अपने बच्चों को ज्यादा मोबाइल इस्तेमाल की लत छुड़वाने के लिए पहुंच रहे हैं। वहीं परिजन काउंसलर को बताते हैं कि उनके बच्चे मोबाइल नहीं मिलने पर चिड़चिड़े हो जा रहे हैं और घर छोड़ देने, जहर खाकर जान देने, फंदे पर लटकने और कमरे में खुद को बंद कर लेने जैसी धमकी दी जाती है। सोनभद्र के बाद गाजियाबाद की घटना को समाजशास्त्री और मनोचिकित्सक बेहद गंभीर और दुःखद बता रहे हैं और अभिभावकों को जागरूक होने के साथ ही ऐसे घातक गेम पर पूर्ण पाबंदी लगाने और बच्चों की लगातार निगरानी की सलाह दे रहे हैं, जिससे ऐसी वारदातों को रोका जा सके।
ऑनलाइन गेम में फंसकर पॉलिटेक्निक छात्र ने फांसी लगाकर दी थी जान -
गत 5 दिसंबर की शाम जनपद सोनभद्र के लोढ़ी स्थित पॉलिटेक्निक कॉलेज के छात्रावास में बलिया जिले के बैरिया थाना अंतर्गत जयप्रकाश नगर निवासी मैकेनिकल ग्रेड प्रथम वर्ष के छात्र युवराज का शव उसके ही कमरे में फंदे से लटकता पाया गया था। जब परिवार के लोगों को इसकी जानकारी मिली तो वह भी एकबारगी अवाक रह गए थे। युवराज के दोस्तों से यूबात के आधार पर पुलिस ने ऑनलाइन गेम में रुपये हारने के अवसाद को मौत की वजह बताई थी।
तेजी से गिर रही सेहत -
जिले के मानसिक रोग कंसलटेंट से मानसिक रोग से पीड़ित लोगों की हिस्ट्री जानने की कोशिश की गई तो यहां बात सामने आई कि कई ऐसे किशोर आ रहे हैं, जिनकी सेहत तेजी से गिर रही है या फिर मोटापे का शिकार हो गए हैं। इन केसों में अभिभावक की ओर से जानकारी दी जा रही है। चिकित्सकों का कहना है कि माता-पिता की शिकायत है कि बच्चा मोबाइल इस प्रकार से चिपक जा रहा है कि सिर्फ मोबाइल चलने और सो जाने तक ही दिनचर्या सीमित रह गई है। कई बार स्कूल जाने की बात पर लड़ने पर भी उतारू हो जा रहे हैं। न समय से खाना है न सोना है। कई बच्चे तो ऐसे आ रहे हैं जो दिन के दिन कमरे में खुद को कैद कर ले रहे हैं। इनकी उम्र लगभग 8 से 16 साल के बीच है। मानसिक रोग विशेषज्ञ काउंसिलिंग के साथ दवा भी दे रहे हैं, जिससे की उनकी दिनचर्या पहले जैसे हो जाए।
साइबर दुनिया का दबाव -
साइबर एक्सपर्ट बताते हैं कि "आज के एप और गेम इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि यूजर लंबे समय तक जुड़े रहें। लगातार नोटिफिकेशन, रिवॉर्ड सिस्टम और ऑनलाइन पहचान किशोरों को वास्तविक दुनिया से काटने लगती है। जब माता-पिता बिना समझाए सीधे रोक-टोक करते हैं तो यह टकराव को और गहरा कर देता है। कई बार वह मोबाइल के प्रयोग से साइबर क्राइम का शिकार भी हो जा रहे हैं। ब्लैकमेल भी किए जा रहे हैं। अभिभावक को बच्चों के मोबाइल की समय-समय पर निगाह रखनी चाहिए। अपनी निगरानी में फोन चलाने दें। इससे गेम जैसी लत का शिकार होने से बच्चे बच सकते हैं।"
बोले मेंटल हेल्थ कंसलटेंट सौरभ कुमार सिंह -
• समय सीमा निर्धारित करें - स्कूल के दिनों में गेमिंग को एक घंटे और सप्ताहांत पर 2-3 घंटे तक ही सीमित रखें
• गैजेट मुक्त क्षेत्र - घर में कुछ स्थान और समय (जैसे भोजन की मेज या सोने से पहले) पूरी तरह से मोबाइल और गैजेट मुक्त रखें
• शारीरिक गतिविधियां - बच्चों को बाहरी खेलों (जैसे क्रिकेट, फुटबॉल) या रचनात्मक शौक (जैसे पेंटिंग, संगीत) के लिए प्रोत्साहित करें
• खुला संवाद - बच्चों से उनकी चिंताओं और भावनाओं पर बात करें ताकि वे अकेलेपन को दूर करने के लिए गेमिंग का सहारा न लें
पैरेंटल कंट्रोल एप का करें इस्तेमाल -
सीएमओ डॉ0 पंकज कुमार राय ने बताया कि "मोइबल गेम की लत के शिकार बच्चे पहुंच रहे हैं। अभिभावक लेकर आते हैं तो उनकी हिस्ट्री के बारे में पता किया जाता है। समस्या कब से है और किसी प्रकार की दिक्कत हो रही है। इसमें चिड़चिड़ा होने, बात पर-पर लड़ने, मोबाइल चलाने और सोने, मोबाइल बंद करने के लिए बोलने पर झगड़ जाने यहां तक घातक कदम जैसे खुद को समाप्त करने की कोशिश के मामले में आ रहे हैं। इनकी काउंसिलिंग और दवा के साथ कुछ मोबाइल एप के बारे में जानकारी दी जा रही है, जो सबसे लोकप्रिय और फ्री है। स्क्रीन टाइम को ट्रैक करने और ऐप को लॉक करने के लिए Google Family Link जैसी तकनीक का उपयोग करें। इसमें आप डेली स्क्रीन लिमिट सेट कर सकते हैं। बच्चे कौन सी एप कितनी देर इस्तेमाल कर रहे हैं, इसकी रिपोर्ट देख सकते हैं। रात में फोन को ऑटोमेटिक लॉक करने का समय तय कर सकते हैं। यह गेमिंग के लिए अलग से समय सीमा तय करने की सुविधा देता है। यू-ट्यूब मॉनिटरिंग और पैनिक बटन जैसे फीचर्स इसमें शामिल हैं।"
बोली विधि विशेषज्ञ -
वहीं विधि विशेषज्ञ गीता गौर ने बताया कि "माता-पिता को चाहिए कि बच्चों को कम से कम मोबाइल का प्रयोग करने दें। अगर कर रहे हैं तो वह पढ़ाई तक सीमित रहे। इसके बाद प्रयोग बंद कर दें। इसमें मां को विशेष ध्यान देने की जरूरत है साथ ही गेम को लेकर कानून बनाने की जरूरत है। जैसे मोबाइल गेम के परीक्षण के बाद ही उसे संचालित करने की अनुमति दी जाए। प्रतिबंध लगाए जाने के संबंध में कानून बनाया जाए। अगर ऐसे गेम नहीं रहेंगे तो इस प्रकार की वारदातों को कम किया जा सकता है।"



