Sonbhadra News : फाइलों में अस्पताल 'फिट', जाँच में अधूरे इंतजाम, निजी हॉस्पिटलों के नवीनीकरण और पंजीकरण पर उठे सवाल
आदिवासी बाहुल्य जनपद सोनभद्र में निजी अस्पतालों के पंजीकरण का आंकड़ा जितना चौंकाने वाला है, उससे कहीं ज्यादा चौंकाने वाला है पंजीकरण की प्रक्रिया को लेकर उठ रही चर्चाओं का सच। जिले में करीब 88 निजी...

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7:47 AM, August 13, 2026
आनन्द कुमार चौबे (संवाददाता)
सोनभद्र । आदिवासी बाहुल्य जनपद सोनभद्र में निजी अस्पतालों के पंजीकरण का आंकड़ा जितना चौंकाने वाला है, उससे कहीं ज्यादा चौंकाने वाला है पंजीकरण की प्रक्रिया को लेकर उठ रही चर्चाओं का सच। जिले में करीब 88 निजी अस्पतालों का पंजीकरण होने की बात सामने आ रही है, जबकि दूसरी ओर जिले में विशेषज्ञ डॉक्टर, सर्जन और एनेस्थेटिस्ट की संख्या गिनी-चुनी है। ऐसे में सवाल यह नहीं कि इतने अस्पताल खुले कैसे, बल्कि इतने अस्पतालों को जरूरी चिकित्सकीय मानक आखिर पूरे कैसे मिले?
वहीं जमीनी स्तर पर उठ रही चर्चाओं में यह तक कहा जा रहा है कि निजी अस्पतालों को 'डॉक्टर लाओ, पंजीकरण पाओ' की तर्ज पर लाइसेंस देने की व्यवस्था चल रही है। पंजीकरण के लिए ‘सेटिंग-गेटिंग’ की चर्चाएं यदि निराधार हैं तो स्वास्थ्य विभाग को पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाकर इन आशंकाओं पर विराम लगाना चाहिए लेकिन यदि पंजीकरण के बाद होने वाली जांचों में बार-बार वहीं डॉक्टर, वहीं संसाधन और वहीं मानक गायब मिल रहे हैं, जिनके आधार पर अस्पताल को लाइसेंस मिला था, तो फिर पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच जरूरी हो जाती है।
लाइसेंस इलाज का या मौत का अस्पताल चलाने की इजाजत -
निजी अस्पताल को पंजीकरण देना महज एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह इस बात का प्रमाण भी माना जाता है कि संबंधित संस्थान निर्धारित चिकित्सकीय मानकों के अनुरूप मरीजों को उपचार देने की स्थिति में है। ऐसे में यदि पंजीकरण हासिल करने के बाद अस्पतालों में डॉक्टर नहीं मिलते, आवश्यक विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं होते, संसाधन अधूरे मिलते हैं या सर्जरी जैसी गंभीर प्रक्रिया में जरूरी विशेषज्ञ व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं तो स्वास्थ्य विभाग की जीकरण व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह लगता है।
जिले के निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान मरीजों की मौत की घटनाएं आए दिन सामने आती हैं, जिससे ना सिर्फ एक व्यक्ति बल्कि एक पूरा परिवार प्रभावित होता है। ऐसे में क्या स्वास्थ्य विभाग सिर्फ लाइसेंस जारी करने तक अपनी जिम्मेदारी मान रहा है, या मरीजों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उतनी ही गंभीरता से निभाई जा रही है? क्योंकि यदि किसी अस्पताल को विभाग ने जांच के बाद पंजीकरण दिया और उसी अस्पताल में बाद में गंभीर अनियमितताएं मिलीं, तो कहीं न कहीं उस पूरी प्रक्रिया की जवाबदेही स्वास्थ्य विभाग तक भी पहुंचती है।
जिले में गिने-चुने विशेषज्ञ, फिर 88 अस्पतालों का पंजीकरण कैसे -
जिले में सर्जन और एनेस्थेटिस्ट जैसे विशेषज्ञ चिकित्सकों की संख्या सीमित है। ऐसे में 88 निजी अस्पतालों का पंजीकरण अपने आप में गंभीर पड़ताल की मांग करता है। पंजीकरण के समय अस्पतालों ने जिन चिकित्सकों और विशेषज्ञों की सेवाएं उपलब्ध होने का दावा किया, क्या वे वास्तव में उसी अस्पताल में नियमित रूप से मौजूद हैं? क्या एक ही डॉक्टर की सेवाओं को अलग-अलग अस्पतालों की फाइलों में दिखाकर मानक पूरा किया गया? क्या सर्जन और एनेस्थेटिस्ट की उपलब्धता कागजों से आगे मौके पर भी सुनिश्चित की गई?
फाइल में ‘फुल मार्क्स’, मौके पर व्यवस्था फेल -
पंजीकरण के समय अस्पतालों की ऑल इज वेल मिलने वाली व्यवस्थाएं बाद में स्वास्थ्य विभाग के ही अधिकारियों की जांच में कैसे फेल हो जाती हैं। कहीं डॉक्टर अनुपस्थित मिलते हैं तो कहीं जरूरी संसाधनों की कमी सामने आती है। कहीं विशेषज्ञ चिकित्सक की उपलब्धता पर सवाल उठता है तो कहीं सर्जरी जैसी गंभीर चिकित्सा प्रक्रिया के लिए आवश्यक व्यवस्था ही अधूरी दिखाई देती है। ऐसे में यह मान लिया जाए कि अस्पताल ने पंजीकरण के बाद मानकों की अनदेखी शुरू कर दी तो सवाल उठता है कि विभाग की निगरानी कहां थी और अगर मानक शुरू से ही पूरे नहीं थे तो पंजीकरण से पहले हुई जांच की गंभीरता पर ही सवाल खड़ा होता है।
सुविधा शुल्क के आधार पर मिलती है सील ओटी की चाभियाँ -
यहीं नहीं यदि जॉच के दौरान किसी हॉस्पिटल में कमी पाई जाती है तो तीन बार व्यवस्था सुधारने का नोटिस जारी करने की प्रक्रिया है तत्पश्चात ऐसे हॉस्पिटलों का पंजीकरण निरस्त करने का प्रावधान स्वास्थ्य विभाग ने स्वयं बनाया था लेकिन स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी अब भी नोटिस दर नोटिस खेल रहे हैं और यदि बड़ी कार्यवाही की बात होती है तो ओटी सील कर अपनी खानापूर्ति कर लेते हैं, जिसकी चाभी भी सुविधा शुल्क के आधार पर अस्पताल संचालक तक उपलब्ध हो जाती है।
सर्जन और एनेस्थेटिस्ट सीमित, फिर इतने अस्पतालों में कैसे हो रही सर्जरी -
मामला उन निजी अस्पतालों में और गंभीर हो जाता है जहां ऑपरेशन और अन्य सर्जिकल सेवाएं संचालित की जा रही हैं। जिले में योग्य सर्जन और एनेस्थेटिस्ट की संख्या सीमित होने के बावजूद यदि बड़ी संख्या में अस्पताल सर्जिकल सेवाएं दे रहे हैं तो प्रत्येक अस्पताल में विशेषज्ञों की वास्तविक उपलब्धता की जांच बेहद जरूरी है।
क्योंकि सर्जरी कागज पर दर्ज विशेषज्ञ के नाम से नहीं होती। इसके लिए मौके पर योग्य सर्जन, एनेस्थेटिस्ट, प्रशिक्षित स्टाफ और आवश्यक संसाधनों की मौजूदगी जरूरी है।
यदि इन मानकों के बिना कहीं सर्जरी हो रही है तो यह महज विभागीय नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि मरीज की जिंदगी के साथ गंभीर जोखिम है।
'सेटिंग-गेटिंग' की चर्चा ने बढ़ाई पंजीकरण प्रक्रिया की बेचैनी -
निजी अस्पतालों के पंजीकरण को लेकर ‘सेटिंग-गेटिंग’ की चर्चाओं को लगातार सामने आ रही विभागीय जांच की तस्वीर और बल दे रही है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि यदि अस्पतालों को पंजीकरण देने से पहले मानकों का वास्तविक और भौतिक सत्यापन किया जाता है तो स्वास्थ्य विभाग की बार-बार होने वाली जांच में वहीं व्यवस्थाएं नदारद क्यों मिलती हैं, जिनके आधार पर पंजीकरण और नवीनीकरण दिया गया? कहीं डॉक्टर नहीं मिलते, कहीं जरूरी संसाधन अधूरे पाए जाते हैं तो कहीं विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता पर सवाल खड़े होते हैं। लगातार जांच में मानकों का इस तरह गायब मिलना महज संयोग मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, कहीं ना कहीं यहीं कमियाँ 'सेटिंग-गेटिंग’ की चर्चाओं को हवा देने के लिए पर्याप्त है।
नवीनीकरण प्रक्रिया पर भी उठ रहे सवाल -
पंजीकरण के बाद नवीनीकरण की प्रक्रिया भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अस्पताल को पहली बार पंजीकरण देते समय यदि सभी मानक पूरे पाए गए तो नवीनीकरण के समय उन्हीं मानकों का दोबारा वास्तविक और भौतिक सत्यापन होना चाहिए। यदि हर बार दस्तावेजों के आधार पर प्रक्रिया पूरी हो जाए और मौके पर स्थिति देखने की जरूरत महसूस न हो तो नवीनीकरण व्यवस्था भी महज कागजी प्रक्रिया बनकर रह जाएगी। यहीं वजह है कि अब जरूरत सिर्फ नए पंजीकरण की जांच की नहीं, बल्कि पुराने पंजीकरण और नवीनीकरण की पूरी श्रृंखला की समीक्षा करने की है।
क्या जॉच के लिए मरीज का मरना जरूरी है -
निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान सामने आ रही मरीजों की मौतों ने पहले ही स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ाई है। हर मौत को अस्पताल की लापरवाही मानना उचित नहीं होगा, लेकिन जब किसी अस्पताल की चिकित्सकीय व्यवस्था, विशेषज्ञों की उपलब्धता या निर्धारित मानकों को लेकर सवाल उठते हों तो विभागीय निगरानी की भूमिका स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर पंजीकरण देने वाला विभाग ही यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहा कि अस्पताल में पंजीकरण के मानक लगातार कायम हैं, तो फिर मरीजों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? ऐसे स्थिति में स्वास्थ्य विभाग की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
क्या बोले जिम्मेदार -
सीएमओ डॉ0 रमेश कुमार मिश्रा ने कहा कि "निजी अस्पतालों का पंजीकरण निर्धारित नियमों और मानकों के अनुसार किया जाता है। अस्पताल में आवश्यक चिकित्सक, विशेषज्ञ, स्टाफ, उपकरण और अन्य सुविधाओं की उपलब्धता का परीक्षण किया जाता है। उन्होंने बताया कि निजी अस्पतालों की लगातार जांच कराई जा रही है और जांच के दौरान मानकों का उल्लंघन मिलने पर अस्पतालों को सील करने के साथ ही संबंधित मामलों में एफआईआर की कार्यवाही भी अमल में लाई जा रही है। पंजीकरण के बाद भी मानकों के अनुपालन की नियमित जांच की जाती है और यदि जांच में निर्धारित मानक पूरे नहीं पाए जाते हैं तो नियमानुसार कार्यवाही की जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मरीजों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और चिकित्सकीय मानकों से किसी भी स्तर पर समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। किसी अस्पताल के पंजीकरण अथवा नवीनीकरण में अनियमितता की ठोस शिकायत मिलने पर उसकी जांच कराकर आवश्यक कार्यवाही की जाएगी।"




