Sonbhadra News : आज खेली जा रही रंगों की होली,सोनभद्र के इस इलाके में एडवांस होली खेलने की है परम्परा
सोनभद्र जिले का आदिवासी बाहुल्य यह इलाका कई त्योहारों को मनाने की परम्परा अति प्राचीन है जिसमें एक त्योहार होली भी है जिसे आदिवासी नियत तिथि से पूर्व मनाते है

सोनभद्र
8:46 AM, March 1, 2026
धर्मेन्द्र गुप्ता (संवाददाता)
विंढमगंज (सोनभद्र)। भारत ही एक देश है जहां अनेक सभ्यता एवं संस्कृति के लोग रहते हैं। इसमें विविधताओं के असंख्य स्वरूप हैं। उसके अपने मायने हैं। अपनी विशेषता है और खूबसूरती है। इसीलिए तो जनपद केआदिवासी बाहुल्य विंढमगंज थाना क्षेत्र के झारखंड व छत्तीसगढ़ के बॉर्डर पर स्थित बैरखड़़ गांव है जहां पर होली मनाने की अलग और अति प्राचीन परंपरा है।
इसके वर्तमान स्वरूप में अत्यंत प्राचीन काल की संस्कृति की झलक दिखाई पड़ती है।प्रायः ऐसी मान्यता है कि बैरखड़ गांव के आदिवासी 5 दिन पहले यानी बीती शनिवार की रात्रि को होलिका दहन तथा आज रविवार को होली का त्योहार आदिवासी परम्परा के अनुसार मना रहे हैं।
होली मनाने की परम्परा को लेकर निर्वतमान ग्राम प्रधान उदय पाल कहते हैं कि गांव में जिन्दा होली मनाने की परम्परा काफी पुरानी है ।गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि बहुत पहले एक बार गांव में भारी धन जन की क्षति हुई थी और गांव महामारी जैसी स्थिति हो गई थी।गांव के लोग काफी परेशान थे तब उसका निदान ढूंढने के लिए आदिवासियों ने काफी पहल किया।उस समय आदिवासी समुदाय के बुजुर्ग लोगो एवं बैगा ने चार - पांच दिन पहले होली मनाने का सुझाव दिया था तभी से बैरखड़ गांव में जिंदा होली मनाने की परंपरा चल पड़ी जिसे आदिवासी समाज आज भी संजोए हुए हैं।
गांव के लोग बताते हैं कि गांव में सुख समृद्धि बनी रहती हैं।
मानर की धुन पर झूमें पुरूष और महिलाएं-
थाना क्षेत्र के बैरखड़ जैसे आदिवासी बाहुल्य गांवों में मानर की थाप पर होली खेलने की परम्परा आज भी कायम है।बैरखड़ गांव आदिवासी जनजाति बाहुल्य गांव हैं ।यहां के निवासी हर त्योहार अपने परम्परा एवं रीति रिवाज के अनुसार मनाते हैं।वैसे भी इस जनजाति का इतिहास प्राचीन काल तक जाता है। ये लोग समूह में इकट्ठा होकर एक-दूसरे को अबीर लगाते है और मानर नामक वाद्ययंत्र की धुन पर नृत्य करते हैं। इस नृत्य में महिलाएं भी शामिल रहती हैं।
नियत तिथि पर नहीं मनाते होली-
बैरखड़ के निवर्तमान ग्राम प्रधान उदय पाल , मनरूप गहंवां,छोटेलाल सिंह ,रामकिशुन सिंह,लाल मोहन गोंड बताते है कि किसी समय होली के दिन सभी आदिवासी लोग नशे में आनंदित थे। सभी लोग नाच-गा रहे थे, तभी किसी अनहोनी घटना में कई लोग एक साथ मर गए थे तब आदिवासी बैगा ने होली मनाने की परंपरा नियत तिथि से पूर्व मनाने की सलाह दी।उसके बाद से गांव में 4 -5 दिन पहले होली मनाई जाने लगी और गांव सुख शांति और अमन चैन कायम हो गई तब से ही गांव में जिंदा होली मनाने की परंपरा हो चली जो अब तक जारी है।उन्होंने बताया कि होलिका दहन बैगा या अपनी ही बिरादरी के मनोनीत बैगा लोगों से कराने की प्रथा है। इस स्थल को संवत डाड़ कहा जाता है।जहां होलिका दहन के अगले दिन यानि आज रविवार को होलिका दहन के अवशेष को उड़ाते हुए दिनभर होली खेलते हुए अपने ईष्ट देव की आराधना एवं पूजा पाठ किया जाता है।



