बैरखड़ के निवर्तमान ग्राम प्रधान उदय पाल , मनरूप गहंवां,छोटेलाल सिंह ,रामकिशुन सिंह,लाल मोहन गोंड बताते है कि किसी समय होली के दिन सभी आदिवासी लोग नशे में आनंदित थे। सभी लोग नाच-गा रहे थे, तभी किसी अनहोनी घटना में कई लोग एक साथ मर गए थे तब आदिवासी बैगा ने होली मनाने की परंपरा नियत तिथि से पूर्व मनाने की सलाह दी।उसके बाद से गांव में 4 -5 दिन पहले होली मनाई जाने लगी और गांव सुख शांति और अमन चैन कायम हो गई तब से ही गांव में जिंदा होली मनाने की परंपरा हो चली जो अब तक जारी है।उन्होंने बताया कि होलिका दहन बैगा या अपनी ही बिरादरी के मनोनीत बैगा लोगों से कराने की प्रथा है। इस स्थल को संवत डाड़ कहा जाता है।जहां होलिका दहन के अगले दिन यानि आज रविवार को होलिका दहन के अवशेष को उड़ाते हुए दिनभर होली खेलते हुए अपने ईष्ट देव की आराधना एवं पूजा पाठ किया जाता है।