Sonbhadra News : हरतालिका तीज आज,पति की लम्बी उम्र के लिए सुहागन महिलाएं रखेंगी व्रत
भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाए जाने वाला यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है।अपने सुहाग की रक्षा के लिए सुहागिनें इस व्रत को बड़े ही विधि विधान के साथ करती हैं।

सोनभद्र
6:50 AM, September 14, 2026
धर्मेन्द्र गुप्ता (संवाददाता)
विंढमगंज (सोनभद्र)। हरतालिका तीज का त्योहार सुहागन महिलाओं के लिए बेहद खास होता है। ये व्रत भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को यानी आज (सोमवार) को मनाया जा रहा है।
ब्रह्ममुहूर्त में उठ महिलाएं अपने व्रत की तैयारी में लग गई। इस व्रत के पूजा का शुभ मुहूर्त प्रातःकाल 6 बजकर 5 मिनट से सात बजकर 6 मिनट तक बताया गया है। वैसे उदयातिथि के अनुसार दिन में भी पूजा करने का मत कुछ पुरोहितों का है।
हरतालिका तीज के दिन भगवान शिव और माता पार्वती का पुनर्मिलन हुआ था।
पौराणिक कथा के अनुसार-
यह हरतालिका व्रत कथा भगवान शिव ने ही माता पार्वती को सुनाई थी। भगवान शिव ने इस कथा में मां पार्वती को उनका पिछला जन्म याद दिलाया था। उन्होंने बताया कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए 107 बार जन्म लिया और 108वी बार पर्वतराज पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के बाद उनकी यह मनोकामना पूर्ण हुई।माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप कर रही थी। माता पार्वती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थी इसलिए उनकी सखियां माता पार्वती की पूजा करती है।
क्यों मनाते है हरितालिका तीज ब्रत_
एक मान्यता के अनुसार इसे सबसे पहले गिरिराज हिमालय की पुत्री उमा ने किया था जिसके फलस्वरूप भगवान शंकर उन्हें पति के रूप में प्राप्त हुए। कथा के अनुसार पूर्वकाल में जब दक्ष कन्या सती, पिता के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव की उपेक्षा होने पर भी पहुंच गई।तब उन्हें बड़ा तिरस्कार सहना पड़ा। ऐसे तिरस्कार का उन्हें अंदेसा नही था।पिता के यहां पति का अपमान देखकर वह इतनी क्षुब्ध हुईं कि उन्होंने अपने आप को अग्नि में समाहित कर भस्म कर दिया। वर्षों बाद वे उमा ही मैना और हिमाचल की तपस्या से संतुष्ट होकर उनके यहां पुत्री के रूप में प्रकट हुईं। उस कन्या का नाम पार्वती रखा गया।इस जन्म में भी उनकी पूर्व-स्मृति बनी रही और वे सदा भगवान शंकर के ध्यान में ही मग्न रहतीं। अपनी इच्छा से वर की प्राप्ति के लिए पार्वती जी तपस्या करती गईं।माता पार्वती किसी भी कीमत पर भगवान शिव को पति के रूप में पाना चाहती थी। पुत्री को तपस्या करते देख पिता हिमाचल चिन्तित हो उठे।उन्होंने देवर्षि नारद के परामर्श पर अपनी बेटी उमा का विवाह भगवान विष्णु से करने का निश्चय किया।वहीँ पार्वती को जब यह समाचार मिला तो वह बहुत दुखी हुईं। पार्वती जी मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं। सखियों के उपचार से होश में आने पर उन्होंने उनसे अपने हृदय की बात कही कि वे शिव जी के अलावा अन्य किसी से विवाह कदापि नहीं करेंगी।शिव जी के प्रति पार्वती का प्रेम जानकर सखियां बोलीं, विष्णु जी के साथ विवाह कराने हेतु तुम्हें लेने के लिए तुम्हारे पिता आते ही होंगे। आओ जल्दी चलो, हम तुम्हें लेकर किसी घने जंगल में छुप जाएं। इस प्रकार पार्वती जी का उनके ही सखियों ने हरण कर लिया। पार्वती जी की सखियों के द्वारा पार्वती का हरण किए जाने के कारण इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा। तब से पुरे देश में इस ब्रत को करने का बिधान बना।
सुहागिनें अपने सुहाग की रक्षा एवं लोकमंगल की कामना हेतु इस दिन व्रत रखकर माता पार्वती की पूजा करती हैं।




