Sonbhadra News : दुद्धी को न स्थायी विधायक मिला और न इओ, तीन साल से प्रभारी चला रहे नगर पंचायत
बताया जाता है कि जनता ने तो एक ही अध्यक्ष चुना था लेकिन नगर पंचायत में चलती कईयों की है। यानी पंचायत कार्यालय में इतनी पंचायत है कि अधिकारी नहीं टिक पाते और अपना तबादला करा लेते हैं।

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10:08 AM, October 17, 2026
- ० अब तक बदल चुके हैं 8 इओ
रमेश यादव (संवाददाता)
दुद्धी कभी स्टेट हुआ करता था मगर आज अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। पूरा विधानसभा सत्र खत्म होने चला मगर दुद्धी को स्थायी विधायक नहीं मिल सका और न नगर पंचायत के तीन साल बीतने के बाद भी स्थायी इओ । लोगों के बीच इस बात की चर्चा होने लगी कि न जाने दुद्धी को किसकी नजर लग गयी कि ऐसा दिन देखना पड़ रहा है।
नगर पंचायत की बात करें तो तीन साल में अब तक 8 इओ बदल चुके है। यदि आप इओ के कार्यकाल का बोर्ड देखेंगे तो आप भी हैरान रह जायेंगे, इतनी जल्दी जल्दी ट्रांसफर हुआ कि किसी को कारण समझ में नहीं आ रहा। आकांक्षा गौतम तो महज 5 दिन ही टिक सकी, जबकि संजय कुमार तीन महीने में चलते बने।वर्तमान ईओ अजय कुमार निषाद का भी ट्रांसफर हो गया हैं, अब नगर पंचायत पूरी तरह मुखिया विहीन हो गया।
चर्चाओं की माने तो नगर पंचायत में इओ जॉइन तो कर लेते हैं मगर कुछ समय बाद वे माहौल देखकर अपना ट्रांसफर करा लेते हैं। बताया जाता है कि जनता ने तो एक ही अध्यक्ष चुना था लेकिन नगर पंचायत में चलती कईयों की है। यानी पंचायत कार्यालय में इतनी पंचायत है कि अधिकारी नहीं टिक पाते और अपना तबादला करा लेते हैं।
लोगों का कहना है टेंडरों में दबाव बनाना और बिना काम पूरा कराये धन की बंदरबाँट करने का यदि कोई दबाव बनायेगा तो कौन इओ अपनी नौकरी फंसायेगा।
लोगों का कहना है कि इन्हीं सब पंचायत के बीच नगर का विकास नहीं हो पा रहा । यह दुर्भाग्य है कि न दुद्धी को स्थायी विधायक मिल सके और न इओ।
लोगों का कहना है कि वर्षों से प्रभारी इओ से काम चलाया जा रहा है। जिससे नगर विकास पर न चर्चा हो पाती है और न प्रस्ताव बन पाते हैं।
नगर की प्रबुद्ध जनता अब सीधे तौर पर सूबे की सरकार और जिला प्रशासन से मांग कर रही है कि इस सीमावर्ती और महत्वपूर्ण क्षेत्र को प्रभारी अधिकारियों के भरोसे छोड़ना बंद किया जाए और स्थायी अधिकारी भेजा जाय। नगरवासियों का कहना है कि जब तक दुद्धी को राजनीतिक दबावों से मुक्त रखकर एक स्थायी, स्वतंत्र और पूर्णकालिक ईओ की तैनाती नहीं की जाती, न राजनीति खत्म होगा और न अधिकारियों के आने-जाने का यह तमाशा बन्द होगा । लोगों का दर्द है कि जनता टैक्स भरने के बाद भी नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं, आखिर उनका क्या कसूर है ।




