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जीवनसाथी पर आए संकट को दूर करने के लिए सुहागिनें रखती हैं वट सावित्री व्रत

धर्मेन्द्र गुप्ता(संवाददाता)

विंढमगंज।बाजार के समीप सलैयाडीह में स्थित मां काली मन्दिर के प्रांगण में दिन सोमवार को सैकड़ों साल पुराने वटवृक्ष के पेड़ के नीचे सलैयाडीह, विंढमगंज, मुड़ीसेमर धरतीडोलवा से गांव की हजारों की संख्या मे महिलाओं की भीड़ लगी रही।वहीं महुली,पतरिहा समेत दर्जनों गांवों में व्रती महिलाओं ने वट वृक्ष की पूजा कर पति की लंबी दीर्घायु होने की कामना की। वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को संपन्न किया जाता है। काली मंदिर के कथा कहने वाले राजीव रंजन तिवारी के द्वारा क्रमबद्ध तरीके से सभी को सावित्री कथा सुनाया जा रहा था। राजीव रंजन तिवारी ने बताया कि बट सावित्री पूजा यह स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन सत्यवान सावित्री तथा यमराज की पूजा की जाती है। सावित्री ने इस व्रत के प्रभाव से अपने मृतक पति सत्यवान को धर्मराज से छुड़ाया था। यह व्रत पति के दीर्घायु के अलावा यह व्रत संतान प्राप्ति के लिए भी उचित बताया जाता है।

बट सावित्री पूजा के दिन सुहागिन स्त्रियां जल से वट वृक्ष को सींच कर तने को चारों ओर सात बार कच्चा धागा लपेट कर परिक्रमा करती है। साथ ही पंखे से वट वृक्ष को हवा करें इसके बाद सत्यवान−सावित्री की कथा सुनती है क्योंकि इस पर्व में सावित्री कथा का बहुत ही महत्त्व होता है। इसके बाद भीगे हुए चनों का बायना निकाल कर उस पर यथाशक्ति रुपए रखकर अपनी सास को देना चाहिए तथा उनके चरण स्पर्श करने चाहिएं। घर आकर जल से अपने पति के पैर धोती हैं और आशीर्वाद लेती है। उसके बाद अपना व्रत खोलती हैं।

आध्यात्मिक महत्व

सावित्री व्रत को करवा चौथ के समान ही माना जाता है ।इस व्रत को संपन्न कर सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण बचाए थे। यह व्रत सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु के लिए रखती हैं ।इस व्रत के प्रताप से पति पर आए संकट दूर हो जाते हैं और दांपत्य जीवन में खुशियां आती है। इस दिन वटवृक्ष के नीचे पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन सावित्री और सत्यवान की कथा सुनने का विधान है। इस कथा को सुनने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। वट वृक्ष में भगवान ब्रह्मा, भगवान श्री हरि विष्णु और भगवान शिव शंकर का वास होता है। माना जाता है कि इस वृक्ष की जड़ में ब्रह्मा, विष्णु और ऊपरी भाग में शिव निवास करते हैं।

वृक्ष की पूजा करने से शनि, मंगल, राहु के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं। बट पूजा से अखंड सौभाग्य और उन्नति की प्राप्ति होती है ।यमराज व सावित्री के साथ वट वृक्ष के नीचे ही संवाद हुआ था। इसी वृक्ष के नीचे पतिव्रता सावित्री को न्याय की प्राप्ति हुई थी ।सभी वट वृक्ष की आयु अधिक होती है। इसमें खंडीत टहनियों का पूजन नहीं करते हुए संपूर्ण वृक्ष की पूजन करना चाहिए। इसमें महिलाएं वस्त्र धारण कर सोलह सिंगार करती हैं। बट सावित्री व्रत करने से जीवन साथी पर आया कोई भी संकट टल जाता है। तत्पश्चात कथा सुनने के बाद महिलाओं ने वटवृक्ष के तने में कच्चा सूत को बांधकर अपने पति के दीर्घायु की कामना कर रही थी।

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