क्यों मनाई जाती हैं बुद्ध पूर्णिमा, पढ़े रोचक कथा

हर साल की तरह इस साल भी वैशाख मास की पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध को बोधगया में ज्ञान प्राप्त हुआ था। कुछ मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान बुद्ध का जन्म भी हुआ था। बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनका जन्म लुंबिनी (वर्तमान नेपाल) में हुआ था। बुद्ध को बिहार के बोधगया में ज्ञान की प्राप्ति हुई। उन्होंने अपना पहला उपदेश वाराणसी के पास सारनाथ में दिया था। बुद्ध को कुशीनगर में महापरिनिर्वाण अर्थात मोक्ष की प्राप्ति हुई।

बुद्ध का जन्म:

गौतम बुद्ध का जन्म ईसा पूर्व छठी शताब्दी में हुआ था। कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन की पत्नी माया ने लुंबिनी नाम के वन में एक पुत्र को जन्म दिया था। उस पुत्र का नाम सिद्धार्थ रखा गया। सिद्धार्थ गौतम ने आगे चलकर बौद्ध धर्म की स्थापना की और महात्मा बुद्ध कहलाए। कहते हैं कि सिद्धार्थ के जन्म के कुछ दिन बाद ही उनकी माता का निधन हो गया था। फिर महामाया की बहन गौतमी ने उनका पालन पोषण किया।

16 साल की उम्र में हो गई शादी:

सिद्धार्थ का लालन-पालन राजसी ठाठ-बाट से हुआ था। महज सोलह साल की उम्र में उनका विवाह यशोधरा से हो गया था। सिद्धार्थ और यशोधरा ने एक पुत्र को भी जन्म दिया, जिसका नाम राहुल रखा गया।

जब सिद्धार्थ को हुआ वैराग्य:

सिद्धार्थ के पास भोग विलास की सारी सुविधाएं थीं। उनके पास कई आलीशान महल थे। उनमें हजारों नौकर और नौकरानियां थीं। मनोरंजन के भरपूर साधन थे। आए दिन महल में नाचगान होता रहता था। सिद्धार्थ भी उनमें डूब गए थे। एक दिन सिद्धार्थ सैर पर निकले। तब उन्हें एक वृद्ध व्यक्ति दिखाई दिया। उसके बाल सफेद हो चुके थे, चेहरे पर झुर्रियां थी, शरीह बेढाल हो चुका था, कमर झुक गई थी। बड़ी मुश्किल से वह चल पा रहा था। सिद्धार्थ ने यह देखा तो वह स्तब्ध रह गए।

थोड़ा आगे जाने पर एक बीमार व्यक्ति मिला, जो अपने अंतिम पड़ाव पर था। वह जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा था। सिद्धार्थ थोड़ा आगे बढ़े तो वहां से एक अर्थी जा रही थी। चार लोग शव को अपने कंधे पर उठाकर ले जा रहे थे, उनके साथ वाले लोग विलाप कर रहे थे। सिद्धार्थ यह सब देखकर चिंतित हो गए।

उनके मन में विचार आया कि एक दिन मैं भी बूढ़ा और बीमार हो जाऊंगा, फिर मृत्यु को प्राप्त हो जाऊंगा। ऐसा जीवन तो धिक्कार है। सिद्धार्थ को फिर रास्ते में एक संन्यासी मिला, जिसके चेहरे पर तेज साफ झलक रहा था। संन्यासी का मन सारी मोहमाया से मुक्त था, होठों पर एक अलग सी मुस्कान थी। सिद्धार्थ को पूरी बात समझ में आ गई।

सिद्धार्थ अपने महल में आए। उन्होंने सबकुछ भोग विलास त्यागकर संन्यासी बनने का मन बना लिया। वह अपनी सुंदर पत्नी और नवजात पुत्र को छोड़कर वन में चले गए। उन्होंने तप किया, कई वर्षों तक कठोर साधना की। लगभग 35 वर्ष की उम्र में सिद्धार्थ गौतम को बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई और सिद्धार्थ गौतम बुद्ध बन गए। कहते हैं कि बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति वैशाख मास की पूर्णिमा को हुई थी। इसलिए बौद्ध अनुयायी हर साल वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं।

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