चंद्रमा ने कैसे गंवाई अपनी रोशनी, पढ़े शिवपुराण की रोचक कथा

शिवपुराण के अनुसार, राजा दक्ष प्रजापति ने अपनी 27 बेटियों का विवाह चंद्रमा के साथ कर दिया था। विवाह के समय उन्होंने चंद्रमा के सामने शर्त रखी थी कि वह अपनी सभी 27 पत्नियों के साथ समान व्यवहार करेगा। चंद्रमा एक एक रात अपनी हर पत्नी के महल में बिताता था लेकिन अपनी रोहिणी नाम की पत्नी से वह अधिक प्यार करता था। जिस रात को वह रोहिणी के महल में जाता उस रात वह सबसे अधिक चमकता था। उसकी शेष पत्नियों को यह बुरा लगता था। उन्होंने अपने पिता से इतनी शिकायत की। दक्ष प्रजापति ने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि वह अपनी चमक खो देगा।

कथा के अनुसार, दिन में सूरज चंद्रमा को अपना दिव्य प्रकाश दे देता था। रात में चंद्रमा दिव्य पेय सोम पीता था, जोकि देवताओं का पेय था। दक्ष के श्राप के कारण देवता अपनी शक्ति का स्रोत हो बैठे। देवतागण इस समस्या का हल पाने के लिए ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी की सलाह पर चंद्रमा ने 1 करोड़ बार मृत्युंजय मंत्र का जाप किया। इससे शिव जी प्रसन्न हो गए और उन्होंने चंद्रमा को श्राप से आंशिक रूप से मुक्त कर दिया। तब से चंद्रमा कुछ विशेष रातों में ही चमकता है।

जानें चंद्रमा के जन्म की मान्यता:

चंद्रमा के जन्म से जुड़ी कई मान्यताएं प्रचलित हैं। स्कंद पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार, जब देवों और असुरों ने क्षीर सागर का मंथन किया तो समुद्र से 14 रत्न निकले थे। उन 14 रत्नों में से चंद्रमा भी एक थे। जिसे शिवजी ने अपने मस्तक पर धारण किया था। दरअसल समद्र से निकले विष को लेकर जब हाहाकार मचा तो शिव जी ने पूरा विष स्वयं पी लिया। जिससे उनका गला नीला पड़ गया। भगवान शिव को शीतल करने के लिए चंद्रमा उनके मस्तक पर निवास करने लगे।
नोट:

यह आलेख धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

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