Sunday , October 2 2022

……आखिरकार 12 ग्रामीणों की मौत का जिम्मेदार कौन?

आनंद कुमार चौबे/एस0 प्रसाद (संवाददाता)

मकरा गाँव मे हो रही मौत से ग्रामीणों में दहशत व्याप्त

● 12 मौत के बाद जागा स्वास्थ्य महकमा, कैम्प लगा कर रहा है मरीजों का इलाज

● ग्रामीणों की मौत के लिए गंदा पानी पीने को जिम्मेदार मान रहा है स्वास्थ्य विभाग

म्योरपुर । म्योरपुर विकास खण्ड अंतर्गत मकरा गाँव में महीने भर में अज्ञात बीमारी से कई बच्चों समेत दर्जन भर ग्रामीणों की मौत के बाद आखिरकार स्वास्थ्य विभाग कुम्भकर्णी निद्रा से जाग गया और स्वास्थ्य विभाग सीएमओ के नेतृत्व में प्रभावित गांवों में कैम्प कर ग्रामीणों की जाँच की जा रही है और दवाओं का वितरण भी किया जा रहा है। लेकिन यदि स्वास्थ्य महकमा पहले ही जाग गया होता तो शायद कुछ लोगों की जान बच सकती थी। ऐसे में इन 12 मौतों का जिम्मेदार कौन? यह एक बड़ा सवाल है। स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन के लिए यह मौत महज आँकड़ा हो सकता है लेकिन इसका दर्द पीड़ित परिवार ही समझ सकता है।

जानकारी के अनुसार रिंहद तलहटी के किनारे बसा 36 टोले का गांव जहां लगभग 800 घर है में एक महीने में अज्ञात बीमारी से बारी-बारी लगभग दर्जन से अधिक मौत हुआ जिसमें बच्चे, अधेड़, बुजुर्ग शामिल है। बिमारी के कहर से स्वास्थ्य विभाग सीएमओ डॉ0 नेम सिंह के नेतृत्व में प्रभावित टोले बिजुल झरिया, कुवारी, मगरहर में कैम्प लगाकर मरीजों सहित ग्रामीणों का मलेरिया, टाइफाइड, डेंगू जैसे अनेक जाँच कर दवा वितरित किया जा रहा है। जाँच में ग्रामीणों में हीमोग्लोबिन की कमी और मलेरिया के मरीज पाए गए हैं, जिनका उपचार चल रहा है।

मुख्य चिकित्साधिकारी भी शनिवार को गांव में पहुंचकर कैम्प का जायजा लेकर आवश्यक दिशा निर्देश दिया साथ ही मृतक के परिजनों के घर जाकर बीमारी का लक्षण जाना। मुख्य चिकित्साधिकारी के अनुसार मच्छरदानी वितरण व मच्छररोधी दवा के छिड़काव के लिए जिला मलेरिया अधिकारी को निर्देशित किया गया था लेकिन किन परिस्थितियों में इनका वितरण नहीं कराया गया इसकी जाँच की जाएगी।

एक तरफ जहाँ स्वास्थ्य विभाग केवल दूषित पानी पीने से मौत का कारण मान अपना पल्ला झाड़ रहा है। वहीं ग्रामीणों ने स्वास्थ्य विभाग पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि यहाँ का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र डॉक्टर विहीन है, जहां हमेशा ताला लटका रहता है। जिसके कारण ग्रामीण मजबूर होकर झोलाछाप पके यहाँ इलाज कराने हेतु मजबूर हो जाते हैं और इमरजेंसी हालत में 108 नं0 एम्बुलेंस के पहुंचने में घण्टों लग जाने से यानी देर हो जाने से कई लोगों की जान चली जाती है। यदि यहाँ डॉक्टर रहते तो समय से इलाज संभव था। लेकिन कई बार संज्ञान में देने के बाद भी आलाधिकारी इस ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया।

वहीं मलेरिया विभाग पर आरोप लगाते हुए ग्रामीणों ने कहा कि बीमारी को देखते हुए ग्राम प्रधान द्वारा अपने स्तर से कुछ मच्छरदानी का वितरण किया गया है लेकिन मलेरिया विभाग द्वारा कभी न तो मलेरिया रोधी दवाओं का छिड़काव कराया गया है और न ही ग्रामीणों के बीच में मेडिकेटेड मच्छरदानी का वितरण किया गया है।

ऐसे में ग्रामीणों के आरोप के बाद मलेरिया विभाग सन्देह के घेरे में आ गया है। मलेरिया विभाग द्वारा लगातार मेडिकेटेड मच्छरदानी वितरण और मलेरिया रोधी दवाओं के छिड़काव का ढ़िढोरा पीटा जा रहा था, और वाहवाही लूटी जा रही थी, जिसकी अब पोल खुल गयी। लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर ये मेडिकेटेड मच्छरदानी का संवेदनशील क्षेत्रों में वितरण क्यों नहीं किया गया जबकि यह क्षेत्र पहले से संवेदनशील रहा है । साथ ही मलेरिया रोधी दवाओं का छिड़काव भी सिर्फ कागजों पर ही करा दिया गयाफिलहाल प्रशासन जांच के नाम पर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी कर ली है । लेकिन यदि जिला प्रशासन इसकी कड़ाई से जाँच कराए तो मलेरिया विभाग का यह एक बड़ा घोटाला सामने आ सकता है।

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