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पितृपक्ष के अंतिम दिन सोन नदी घाट पर लोगों की उमड़ी भीड़

घनश्याम पांडेय/विनीत शर्मा (संवाददाता)

चोपन । चोपन स्थिति सोन नदी घाट पर पितृपक्ष की पूजा पुजारियों के माध्यम से की गई। इस दौरान हज़ारों की संख्या में कई जगह से आये लोगों ने पितृ श्राद्ध श्रद्धापूर्वक किया। *आपको बता दे कि,* आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या पंद्रह दिन पितृपक्ष (पितृ = पिता) के नाम से विख्यात है। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों (पूर्वजों) को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं। पिता-माता आदि पारिवारिक मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात्‌ उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं।
श्राद्ध के माध्यम से पितरों को तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है। पिण्ड रूप में पितरों को दिया गया भोजन श्राद्ध का अहम हिस्सा होता है।

पितृपक्ष का महत्व

पितरों की शांति के लिए हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष श्राद्ध होते हैं। मान्यता है कि इस दौरान कुछ समय के लिए यमराज पितरों को आजाद कर देते हैं, ताकि वह अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें। *ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानी पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए। हिंदू ज्योतिष के अनुसार भी पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक माना जाता है। पितरों की अशांति के कारण धन हानि और संतान पक्ष से समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है। अत: श्राद्ध पक्ष के दौरान पितृ श्राद्ध और तर्पण अवश्‍य करना चाहिए।

विश्व के लगभग सभी धर्मों में यह माना गया है कि मृत्यु के पश्चात् व्यक्ति की शरीर का तो नाश हो जाता है, लेकिन उनकी आत्मा कभी भी नहीं मरती है। पवित्र गीता के अनुसार जिस प्रकार स्नान के पश्चात् हम नवीन वस्त्र धारण करते है। उसी प्रकार यह आत्मा भी मृत्यु के बाद एक देह को छोड़कर नवीन शरीर धारण करती है।
हमारे पित्तरों को भी सामान्य मनुष्यों की तरह सुख-दुख मोह ममता भूख प्यास का अनुभव होता है। यदि पितृ योनि में गये व्यक्ति के लिये उसके परिवार के लोग श्राद्ध कर्म तथा श्रद्धा का भाव नहीं रखते है तो, वह पित्तर अपने प्रियजनों से नाराज हो जाते है।

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