गुम हो गयी ‘डाकिया डाक लाया’ वाली आवाज, जंग खा रहा पोस्टऑफिस का लेटर बॉक्स

घनश्याम पाण्डेय/विनीत शर्मा (संवाददाता)

चोपन। ‘डाकिया डाक लाया, खुशी का पैगाम …’ किसी फिल्म का यह गीत अपने जमाने में काफी मशहूर था । एक जमाना था जब लोग डाक विभाग द्वारा लगाये गये बाक्स का इस्तेमाल करते थे । लोग डाक के माध्यम से एक – दूसरे का हालचाल एवं जानकारी लेते थे। सादे कागज पर अपनी बात लिखना और उसे डाक विभाग द्वारा लगाये गये बाक्स में डालकर लोग उसे अपनो तक भेजा करते थे । संचार क्रांति की दुनिया में अब लेटर बाक्स शो पीस बनकर रह गया है । कई जगहों पर तो लेटर बाक्स जर्जर हो गया है तो कई स्थानों पर लगे बाक्स में कोई लेटर नहीं डालता है । मोबाइल युग से पहले डाकिया पैदल एवं साइकिल से गांव – गांव में घुमकर लोगों के दरवाजे पर पहुंचकर लेटर देते थे। उस लेटर को पढ़ने के लिए पूरा परिवार एक साथ होता था। बेटी अपनी मां के लिए तो पिता अपने बेटे के लिए पत्र लिखता था। अब मोबाइल युग में लेटर बाक्स अपना अस्तित्व खोता जा रहा है । जरा याद करिए, जब पीसीओ पर लोग अपनो से बात करने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते थे । जब गांवों में किसी के पास टेलीफोन होता था और उसका नंबर लोग अपने रिश्तेदारों एवं संबंधियों को दिया करते थे । गांव के किसी व्यक्ति का उस पर फोन आता था तो संदेश उन तक पहुंचाया जाता था । संचार क्रांति ने दुनिया में तेजी तो जरूर लायी लेकिन लोगों को एक दूसरे से दूर कर दिया । लोग बातचीत से भले ही करीब हों मगर दिलों में नजदीकियां नहीं रहीं ।



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