अब तक सामने आ चुके हैं ब्लैक फंगस के कुल 7251 केस, पढ़ें क्या-क्या है लक्षण

देश में कोरोना की दूसरी लहर के बीच एक और फिक्र काफी बड़ी होती जा रही है यानी ब्लैक फंगस की । देश में अब तक ब्लैक फंगस के कुल 7251 केस सामने आ चुके हैं और कई प्रदेशों में इसे महामारी घोषित कर दिया गया है आज बच्चों में भी ब्लैक फंगस का पहला मामला सामने आया। गुजरात के अहमदाबाद में 13 साल के बच्चे की सर्जरी की गई। हरियाणा के सिरसा में भी इस बीमारी से एक नाबालिग की मौत हो गई । जिसके बाद ब्लैक फंगस को लेकर दहशत बढ़ती जा रही है, लेकिन आज हम आपको बताएंगे कि ब्लैक फंगस से डरने की जरूरत नहीं है ।

महाराष्ट्र में ब्लैक फंगस के अब तक 1500 केस सामने आए हैं, जिनमें 90 मरीजों की मौत हो गई। गुजरात में सबसे ज्यादा 1163 केस आए और 61 मरीजों की जान चली गई । मध्य प्रदेश में ब्लैक फंगस के 575 केस आए और 31 की मौत हो गई ।हरियाणा में 268 मरीज मिल चुके हैं और 8 की जान गई ।दिल्ली में अब तक 203 केस आए हैं और एक व्यक्ति की मौत हुई है। उत्तर प्रदेश में ब्लैक फंगस के 169 मामले दर्ज किए गए और इससे आठ मौतें हुई हैं ।बिहार में अब तक 103 केस और 2 मौत की खबर आई है ।छत्तीसगढ़ में 101 मरीज मिले हैं और एक व्यक्ति की जान गई है ।कर्नाटक में 97 मामले सामने आए हैं और आधिकारिक आंकड़ों में मौत दर्ज नहीं है। तेलंगाना में 90 मरीज मिल चुके हैं और 10 की मौत हो चुकी है।

अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों में भी कोरोना के कुछ मरीजों में ब्लैक फंगस के मामले देखे गए हैं, लेकिन भारत में इसके मामलों में अचानक तेजी देखी गई ।खासतौर से कोरोना की दूसरी लहर में ब्लैक फंगस की बीमारी लोगों में ज्यादा फैल रही है । ब्लैक फंगस को लेकर फिक्र बड़ी होने लगी और इससे जुड़ी कई अफवाहें फैलने लगीं। तो देश के जाने माने डॉक्टर्स इस शंका को दूर करने सामने आए। AIIMS के डायरेक्टर डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने बताया कि कोरोना की दूसरी लहर में ज्यादा स्टेरॉयड के सेवन से ब्लड शुगर लेवल बढ़ने और ब्लैक फंगस का खतरा बढ़ सकता है ।

डॉ. रणदीप गुलेरिया ने ये भी बताया कि ब्लैक फंगस को लेकर कई झूठ दावे फैलाए जा रहे हैं कि ये कच्चा खाना खाने से हो रहा है लेकिन इसकी पुष्टि करने के लिए कोई आंकड़ा नहीं है । वहीं ऑक्सीजन के इस्तेमाल से भी इसका कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन कई डॉक्टर कहते हैं कि कोरोना काल में घरों में आइसोलेशन में रहने वाले कई मरीज इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन भी ले रहे हैं क्योंकिं मेडिकल ऑक्सीजन और इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन में अंतर होता है । मेडिकल ऑक्सीजन पूरी तरह शुद्ध होता है और इसे बनाने में कम्प्रेशन, फिल्ट्रेशन और प्यूरीफिकेशन के चरणों का खास ख्याल रखा जाता है, जबकि घरों में लिए जा रहे ऑक्सीजन में अगर डिस्टिल वॉटर का प्रयोग नहीं किया जा रहा है । तो इससे ब्लैक फंगस का संक्रमण हो सकता है ।

ब्लैक फंगस के लक्षण को लेकर भी जितनी मुंह उतनी बातें चल रही हैं, लेकिन AIIMS की गाइडलाइन के मुताबिक कोरोना मरीजों की देखभाल करने वाले इन लक्षणों पर निगाहें रखें । जैसे नाक से खून बहना, असमान्य काला स्राव या पपड़ी निकलना, नाक में ब्लॉकेज या बंद होना, सिरदर्द या आखों में दर्द, आंखों में लालिमा, आंख खोलने-बंद करने में दिक्कत, आंखों के आसपास सूजन, दो-दो चीजें दिखना, चेहरे का सुन्न होना और मुंह खोलने और चबाने में दिक्कत। इसीलिए मेदांता हॉस्पिटल के चेयरमैन डॉ. नरेश त्रेहान कहते हैं कि ब्लैक फंगस को नियंत्रित करने की कुंजी स्टेरॉयड का विवेकपूर्ण इस्तेमाल और ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करना ही है ।

ब्लैक फंगस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार फिक्र जताते आ रहे हैं और शुक्रवार को जब उन्होंने काशी के डॉक्टर्स और हेल्थकेयर वर्कर्स के साथ वर्चुअल चर्चा की, तो उनकी जुबान पर एक बार फिर ब्लैक फंगस का जिक्र था, लेकिन इस मीटिंग में खास तौर पर कोरोना को कंट्रोल करने के काशी मॉडल पर चर्चा की गई, जिसकी वजह से पीएम के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में कोरोना संक्रमण की दर 40 परसेंट से घटकर सिर्फ 3 परसेंट रह गई है । इस कामयाबी पर सबको बधाई देते हुए पीएम मोदी कैसे भावुक हो गए। पीएम ने कहा कि वायरस ने हमारे कई अपनों को छीन लिया है। पीएम ने हेल्थ वर्कर्स के काम की जमकर तारीफ की ।

BHU के सर सुंदरलाल अस्पताल के अधीक्षक प्रो. केके गुप्ता ने प्रेजेंटेशन देते हुए बताया कि वाराणसी में तुरंत इलाज, वैक्सीनेशन और माइक्रो कंटेनमेंट जोन से कोरोना पर कंट्रोल किया गया । अप्रैल में वाराणसी में कोरोना संक्रमण दर 35 से 40 परसेंट के बीच पहुंच गई थी, जिसके बाद कोरोना कंट्रोल के लिए वाराणसी के कमिश्नर दीपक अग्रवाल और जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा ने जो मॉडल तैयार किया, उससे अब संक्रमण दर 3 परसेंट रह गई है। इसके लिए अस्पतालों में रोज बेड की संख्या बढ़ाई गई, निजी अस्पतालों की मनमानी रोकने के लिए मजिस्ट्रेट तैनात किए गए, तो साथ में छोटे-छोटे कंटेनमेंट जोन बनाए गए ।

438 सदस्यों की 174 निगरानी समितियां बनाई गईं, हर समिति को ऑक्सीमीटर, थर्मल स्कैनर और दवाइयों की किट दी गई, ताकि संक्रमितों की पहचान की जा सके और उनका इलाज किया जा सके । शहर में एक कमांड सेंटर बनाया गया और कंटेनमेंट जोन से लेकर अस्पतालों तक के लिए अलग-अलग डेस्क बनाए गए, ताकि संक्रमित इलाकों की घेराबंदी से लेकर अस्पतालों में एक-एक बेड को मैनेज किया जा सके. होम आइसोलेशन में रहने वालों और टेलीमेडिसिन के लिए अलग डेस्क की व्यवस्था की गई और सभी डेस्क की जवाबदेही तय की गई । इतना ही नहीं, दूसरी लहर की आशंका देखते हुए वाराणसी में नवंबर में ही BHU में 20 हजार लीटर का ऑक्सीजन प्लांट लगा दिया गया । इससे यहां पर कभी ऑक्सीजन की किल्लत भी नहीं हुई । काशी का ये ही कोरोना मॉडल काम कर गया और यहां पर अब स्थितियां नियंत्रण में बताई जा रही हैं ।



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