राजनीतिक दलों के अधिकृत दावेदारों के आने से चुनाव दिलचस्प

मनोहर कुमार

* सियासी दलों के लिए बागी बिगाड़ सकते हैं खेल
* जिला पंचायत सदस्य पद पर होगा मुकाबला
* निष्ठा व अनुशासन भी दांव पर

चंदौली। धान के कटोरे के रूप में विख्यात चंदौली जनपद में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के सहारे सियासत के धागे भी मजबूत किए जा रहे हैं। 2022 के विधान सभा चुनाव की बुनियाद इसी पंचायत चुनाव में रखी जा रही है। लगभग सभी राजनीतिक दल अधिकृत उम्मीदवारों के सहारे जिला पंचायत सदस्य बनाने की फिराक में हैं। जहां से जिले की प्रथम नागरिक की कुर्सी कब्जे में कर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत कर सके। अब दलों के सामने अधिकृत उम्मीदवारों को जिताने के साथ दलीय निष्ठा व अनुशासन को भी बरकरार रखना है। इधर बहुत से बगावती मैदान में आ सकते हैं।
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में इस बार राजनीतिक दल भी ऊहापोह व कार्यकर्ताओं की नाराजगी को छोड़ अब अधिकृत उम्मीदवार मैदान में उतार दिए हैं।जनपद में राजनीति व सियासत भी तेज हो है।अपने आप को राजनीतिक दल क्षेत्र पंचायत तथा ग्राम प्रधान चुनाव से दूर रख रहे हैं, उनका फोकस जिला पंचायत सदस्य के चुनाव पर है। इसकी वजह जातीय समीकरणों को माना जा रहा है। पार्टियों को डर है कि ग्राम प्रधान के चुनाव में एक ही जाति के कई प्रत्याशी चुनाव मैदान में होते हैं। ऐसे में एक प्रत्याशी का समर्थन उस जाति के तमाम दूसरे लोगों के विरोध का कारण बन सकता है।आगामी विधानसभा चुनाव में जिसका खामियाजा पार्टी को उठाना पड़ सकता है। पंचायत चुनाव
अभी तक कभी भी दलीय आधार पर नहीं हुआ है। राजनीतिक दल जिला पंचायत सदस्य और अध्यक्ष के चुनाव में खुलकर समर्थित प्रत्याशी देते रहे हैं। इसके अलावा बीडीसी चुनाव में भले ही पार्टियों का कभी सीधा दखल नहीं रहा, लेकिन समर्थित ब्लॉक प्रमुख बनाने के लिए सब दांव-पेंच चलते रहे हैं। लेकिन, इस बार राजनीतिक सरगर्मी ने गांवों के चुनाव की तपिश बढ़ा दी है। बड़े दलों के अलावा तमाम छोटे दल भी पंचायत चुनाव में दो-दो हाथ करने को तैयार हैं।जनपद में 35 जिला पंचायत सदस्य पद हैं।इस पद के लिए राजनीतिक दल अधिकृत उम्मीदवारों की सूची भी जारी कर दी हैं व कर भी रहे हैं। चुनाव की घोषणा से पहले व आरक्षण की स्थिति स्पष्ट होने के बाद भी बहुत से दावेदार मैदान में ताल ठोक रहे हैं। विभिन्न दलों के अधिकृत दावेदारों के सामने आने के बाद अन्य दावेदारों में ऊहापोह की स्थिति है।कुछ मैदान में डटे रह सकते हैं।भले ही अनुशासन का चाबुक चले।अगर जीत जाते हैं तो अनुशासन व दलीय निष्ठा कायम हैं।नहीं बाद में राजनीतिक परिवार अपना है ही। अब देखना है कि अधिकृत दावेदारों के आने के बाद से जिला पंचायत सदस्य पद का चुनाव कितना दिलचस्प होता है।



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