होली की आहट से प्रकृति भी हो जाती है सराबोर,फूली में आ जाती हैं रंगत

रमेश यादव ( संवाददाता )

दुद्धी ।बसन्त ऋतु के बाद से ही प्रकृति अपना यौवन बिखेरना शुरू कर देती है और वातावरण में उललास छा जाता है।नव पल्लवों से सुसज्जित पेड़ पौधे ,आम के बौर एवं महुए की मादकता से मस्त कोयल की कूक बिरहिनो के लिए दिल में हूक बनकर टीस पैदा करती है।इस रंगों की होली में नव नवेली दुल्हन अपने पिया की बाट जोहती है।होली के पास आते ही यह प्रकृति रंगों से सराबोर हो जाती है। रवि की फसलें भी बसन्ती बयार के कारण अपने परिपक्वता की उफान पर होती है।
सेमल व पलाश के पेड़ों पर उगने वाले मोहक फूल केवल प्रकृति का श्रृंगार ही नही करते अपितु मानव भी इसे अपने लिए उपयोगी बना लेते है।गाँवों में पलाश के फूलों से रंग बनाये जाने की परम्परा के ह्रास होने से कृतिम रंगों का प्रयोग चलन में तेजी से बढ़ा है।जिसका साइड इफेक्ट 100%देखने को मिल रहा है।वैसे अभी तक क्षेत्र में पलाश के पेड़ों पर कम पुष्प कम दिख रहा है।इस बार होली के पूर्व पलाश के पेड़ों पर पुष्प कम आने की वजह बताते हुए पर्यावरण चिंतक जगत विश्वकर्मा ने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग के दौर में बढ़ते जा रहे कल-कारखानों से निकलने वाले प्रदूषण इसके सबसे बड़े जिम्मेदार कारण है।उनकी माने तो प्रदूषण एवं वनों की कटान की वजह से पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित है।इसका असर मानव जीवन सहित अन्य प्राणियों एवं पेड़ पौधों पर देखा जा सकता है।

पलाश को प्राप्त है राज्य पुष्प का दर्जा

ग्रामीण क्षेत्रों में पलाश के पेड़ों पर लाह उगाया जाता रहा है जिससे सरकार को राजस्व के रूप में आमद होती है।इसका बीज कृमिनाशक होने के वजह से चिकित्सा जगत में भी उपयोगी सिद्ध होता है।पुराने लोग बताते है कि गर्मी के दिनों में पलाश के पुष्प का प्रयोग शर्बत में किया जाता है क्योकि इसकी तासीर ठण्डी होती है।
ईंधन के अलावे आध्यात्मिक दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व है।इन्ही सब बजहों से उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे राज्य पुष्प का दर्जा दे रखा है।



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