हिंद दी चादर कहलाए जाने वाले नौवें गुरु, गुरु तेगबहादुर

हिंद दी चादर कहलाए जाने वाले नौवें गुरु, गुरु तेगबहादुर जी ने धर्म और मानवता की रक्षा करते हुए हंसते-हंसते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। उनकी शहादत हर साल शहीदी दिवस के रूप में याद की जाती है। उन्होंने आस्था, विश्वास और अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया इसलिए उन्हें सम्मान के साथ हिंद दी चादर कहा जाता है। विश्व के इतिहास में श्री गुरु तेग बहादुर जी साहब का स्थान अद्वितीय है।

श्री गुरू जी ने हमेशा यही संदेश दिया कि किसी भी इंसान को न तो डराना चाहिए और न ही डरना चाहिए। उन्होंने दूसरों को बचाने के लिए अपनी कुर्बानी दी। माना जाता है कि श्री गुरु तेग बहादुर जी की शहादत दुनिया में मानव अधिकारों के लिए पहली शहादत थी। गुरु जी जहां भी गए, लोगों के लिए सामुदायिक रसोई और कुएं स्थापित किए। धैर्य, वैराग्य और त्याग की मूर्ति श्री गुरु तेग बहादुर जी ने 20 वर्ष तक साधना की। उन्होंने धर्म के प्रसार के लिए कई स्थानों का भ्रमण किया। अंधविश्वासों की आलोचना कर समाज में नए आदर्श स्थापित किए। श्री गुरु तेगबहादुर जी की शहादत के बाद उनके बेटे गुरु गोबिंद राय को गुरु गद्दी पर बैठाया गया जो दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी कहलाए। गुरु तेग बहादुर जी को वेद, पुराण और उपनिषदों का भी ज्ञान था। उनके द्वारा रचित 115 पद्य श्रीगुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं। दिल्ली में श्री गुरु तेगबहादुर जी की याद में शहीदी स्थल पर गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा शीशगंज साहिब है।



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