ओबरा में अतिक्रमण हटाये पर उठी आवाज, जब लोग अतिक्रमण कर रहे थे तो उस वक्त क्यों नहीं रोका गया

कृपाशंकर पांडे (सवांददाता)

ओबरा । ओबरा ‘सी’ परियोजना का निर्माण शुरू हुआ तो ओबरा वासियों के खुशी का ठिकाना नहीं था। उनको लगने लगा कि उन्हें अब रोजगार के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ेगा और न ही पैसे की किल्लत होगी। मगर जैसे-जैसे ओबरा सी का विस्तार होने लगा उसका दायरा भी बढ़ने लगा । जमीनें खोजे जाने लगी। इसी कड़ी में ओबरा थाना रोड की दुकानें भी इसकी जद में आ गयी । कई दशकों से अपनी दुकान व गृहस्ती जमाये लोगों को प्रशासन द्वारा खाली कराए जाने का नोटिस मिला तो हड़कम्प मच गया । व्यापार मंडल ने भी इसका विरोध किया और लखनऊ जाकर इस पूरे मामले की जानकारी सीएम तक पहुंचाई । बताया गया कि आश्वासन भी मिला कि किसी की दुकान व घर नहीं टूटेगा । लेकिन गांधी जयंती बीतते ही प्रशासन अपने दलबल व मशीन लेकर जा धमका । सुबह अभी कई लोग दुकान लगाने की तैयारी कर रहे थे कि प्रशासन ने गिराने की कार्यवाही शुरू कर दी । स्थानीय लोग सहित नेता भी मौके पर पहुंचकर महज तमाशबीन बने रहे ।

व्यापारियो ने बताया कि यहां पर लगभग 400 सौ दुकाने थीं जो अपने परिवार का भरण पोषण किया करते थे । अब वे सब बेघर हो गये ।
वहीं मौके पर पहुंचे सपा जिला उपाध्यक्ष रमेश सिंह यादव ने जमकर भाजपा पर भड़ास निकाला । उनका कहना है कि आज इस मुसीबत की घड़ी में कोई विधायक या जनप्रतिनिधि खड़ा होकर आंसू भी पोछने वाला नहीं है । उनके द्वारा हमेशा से गुमराह किया गया ।

रमेश सिंह ने बताया कि शासन-प्रसाशन के लोग 2016 से अब तक कई बार लखनऊ गये । व्यापारी लखनऊ आने जाने से गुमराह होता रहा । इतना ही नहीं ओबरा में व्यापारीयो द्वारा कई बार धरना-प्रदर्शन तक किया गया लेकिन परियोजना अधिकारी हर बार धरने को खत्म कराने के लिए झूठ बोला गया । उनके द्वारा हमेशा 15 फिट छोड़े जाने की बात कही गयी और आज कोई बोलने को तैयार नहीं ।

स्थानीय लोगों का कहना है कि एक तो कोरोना काल से अभी लोग जूझ रहे हैं उसी में यह मुसीबत लोगों को और भी तोड़ दिया है । लोग का कहना है कि वे कहां जाएं और क्या करें कुछ भी नहीं सूझ रहा ।

बहरहाल विकास के लिए अतिक्रमण हटाना कोई गलत नहीं है लेकिन सवाल यह उठता है कि जब लोग अतिक्रमण कर अपने दुकानों को लगा रहे थे तो उस समय प्रशासन द्वारा क्यों नहीं रोका गया । यदि उस समय रोका गया होता तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता और न पूरा परिवार इस मुसीबत से जूझता ।

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