संयुक्त राष्ट्र महासभा में पीएम मोदी ने उठाया सवाल, भारत को कब तक निर्णय प्रक्रिया से अलग रखा जाएगा

कोरोना संकट के दौर में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का 75वां सत्र वर्चुअल तरीके से आयोजित किया जा रहा है, शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए महासभा को संबोधित करते हुए संयुक्त राष्ट्र में भारत के योगदान का जिक्र किया और यह सवाल भी उठाया कि भारत को कब तक निर्णय प्रक्रिया से अलग रखा जाएगा ।

भारत एक लोकतांत्रित और शांति प्रिय देश है । भारत आजादी के बाद से ही संयुक्त राष्ट्र से जुड़ा हुआ है और उसकी ओर से आयोजित संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों (UNPKO) में जोर-शोर से शामिल होता रहा है। भारत की संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना में योगदान देने की एक लंबी और गहरी परंपरा रही है ।पीएम मोदी ने आज यूएन में भारत को योगदान का जिक्र किया तो ऐसे में हम आपको पिछले 7 दशक से भी ज्यादा लंबे दौर में भारत की ओर से योगदान के चंद उदाहरण देने जा रहे हैं ।

1948 के बाद से दुनियाभर में अब तक 71 संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में से 49 में 2 लाख से अधिक भारतीय सैन्य और पुलिसकर्मियों ने अपनी सेवा दी है। वर्तमान में, भारत से 6,700 से अधिक सैनिक और पुलिसकर्मी हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में अलग-अलग जगहों पर तैनात किया गया है, जो सैन्य योगदान करने वाले देशों में चौथा सबसे बड़ा योगदान है ।

हालांकि यूएन शांति मिशन के दौरान 168 भारतीय शांति सैनिकों को अपने कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान शहादत भी मिली ।

1950 में भारतीय सेना की 60 पैराशूट फील्ड एम्बुलेंस को कोरियाई युद्ध में हिंसाग्रस्त इलाकों में मेडिकल कवर प्रदान करने के लिए भेजा गया था ।संयुक्त राष्ट्र सेना कोरियाई युद्ध में लगी हुई थी । भारतीय यूनिट ने कुल साढ़े तीन साल (नवंबर 1950 से मई 1954) में कोरिया में सेवा की और यह संयुक्त राष्ट्र के झंडे के तले किसी भी सैन्य इकाई द्वारा सबसे लंबा एकल कार्यकाल रहा ।

1958 में भारतीय सेना संयुक्त राष्ट्र इमरजेंसी फोर्स (UNEF) के हिस्से के तहत गाजा के एक समुद्र तट पर डेनिश और स्वीडिश शांति सैनिकों के साथ संयुक्त रूप में प्रशिक्षण अभ्यास पर शामिल हुई थी ।

15 नवंबर 1956 से 19 मई 1967 तक, भारत की 11 इंफेंट्री बटालियनों ने संयुक्त राष्ट्र इमरजेंसी फोर्स (यूएनईएफ 1) में रोटेशन के जरिए सेवा प्रदान की ताकि फ्रांस, ब्रिटेन और इजरायल की मिस्र के क्षेत्र से वापसी की राह सुनिश्चित की जा सके, साथ ही इजरायल और उसके अरब पड़ोसियों के बीच शांति बनाए रखी जा सके । हालांकि इस ऑपरेशन में 27 भारतीय संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों ने अपनी जान गंवाई ।

1960 में कांगो में स्थिति बेहद खराब हो गई और वहां की सरकार ने यूएन से मदद की अपील की । 14 जुलाई 1960 और 30 जून 1964 के बीच, दो भारतीय ब्रिगेड ने ONUC UNPKO में भाग लिया. इस ऑपरेशन में 39 भारतीयकर्मियों ने अपनी जान गंवाई । कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया को परमवीर चक्र से नवाजा गया ।कांगो में संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षा के लिए अपना जीवन लगाने के लिए भारत के सर्वोच्च सैन्य पुरस्कार परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया एकमात्र संयुक्त राष्ट्र के शांतिदूत बने ।

भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन पर महिलाओं को भेजने की एक लंबी परंपरा रही है। 1960 में, भारतीय सशस्त्र बल चिकित्सा सेवाओं में सेवारत महिलाओं को कांगो में शांति स्थापित करने के लिए भेजा गया।

1990 के दशक के शुरुआत में शीत युद्ध के खत्म होने के समय कई जगह संकटपूर्ण स्थिति बनी। अकेले 1989 से 1994 के बीच 20 से अधिक नए UNPKO चलाए गए । इन अभियानों में भारत का योगदान काफी रहा ।

2007 में, संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के लिए एक महिला टुकड़ी तैनात करने वाला भारत पहला देश बना था । लाइबेरिया में गठित इस पुलिस यूनिट ने 24 घंटे की गार्ड की ड्यूटी की और राजधानी मोनरोविया में रात्रि गश्त का संचालन किया और लाइबेरियन पुलिस की क्षमता का निर्माण करने में मदद भी की थी।

भारतीय शांति सैनिकों ने संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में दुनिया के कई देशों में अपनी सेवाएं दी हैं। वे हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में नागरिकों की रक्षा करते हैं और शांति प्रक्रियाओं को बनाए रखने की कोशिश करते हैं । इरिट्रिया में, भारतीय इंजीनियरों ने यूएन मिशन इन इथियोपिया और इरिट्रिया (UNMEE) के तहत सड़कों के पुनर्निर्माण में मदद की।

भारतीय डॉक्टर अफ्रीकी देश लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो समेत दुनिया भर के मिशनों में स्थानीय आबादी को चिकित्सा व्यवस्था प्रदान करते हैं । इसी तरह लंबे समय तक हिंसा से पीड़ित रहे सूडान में भी भारतीय शांति दूतों ने अहम भूमिका निभाई । बड़ी संख्या में भारतीय चिकित्सकों ने अपनी सेवाएं दीं ।

भारतीय शांति सैनिकों ने पिछले 2 दशकों में हिंसा से ग्रस्त लेबनान, कांगो, सूडान, दक्षिणी सूडान. गोलान हाइट्स, आइवरी कोस्ट, हैती और लाइबेरिया में शांति स्थापना और मेडिकल सुविधाओं समेत कई तरह से योगदान दिया है और यह आगे भी जारी रहेगा । 2400 से ज्यादा भारतीय सैन्य और पुलिसकर्मी शांति सैनिक के रूप में इस समय सूडान में तैनात हैं ।

साथ ही वर्तमान में दुनिया कोरोना संकट से जूझ रही है और भारत ने भरोसा दिलाया है कि उसकी ओर से तैयार वैक्सीन दुनिया के लोगों के लिए मुहैया कराया जाएगा ।

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