कृषि और किसानों से जुड़े दो बिलों को लेकर किसानों के विरोध की गूंज संसद से सड़क तक सुनाई दे रही है। दोनों बिल लोकसभा में गुरुवार को पास हो गए । आइए आसान भाषा में जानते हैं कि क्या है इन बिलों में और क्या बताए जा रहे हैं इनके लाभ? साथ ही इनको लेकर क्या आशंकाएं जताई जा रही हैं, उस पर भी एक नजर डालते हैं ।

ये हैं दो बिल कौन

– कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) विधेयक-2020
– कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020

कृषि से जुड़े इन दो बिलों के अलावा आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 के प्रावधानों को लेकर भी किसानों की ओर से ऐतराज जताया जा रहा है । इस बिल को पहले ही लोकसभा में पास कराया जा चुका है ।

जहां तक कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) विधेयक-2020 का सवाल है तो ये राज्य-सरकारों की ओर से संचालित एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (APMC) मंडियों के बाहर (“बाजारों या डीम्ड बाजारों के भौतिक परिसर के बाहर”) फार्म मंडियों के निर्माण के बारे में है । भारत में 2,500 एपीएमसी मंडियां हैं जो राज्य सरकारों द्वारा संचालित हैं ।

वहीं दूसरा बिल [कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020)] कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग या अनुबंध खेती के बारे में है।

नए बिलों के लाभ

1. राज्यों की कृषि उत्पादन विपरण समिति यानि एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (APMC) के अधिकार बरकरार रहेंगे । इसलिए किसानों के पास सरकारी एजेंसियों का विकल्प खुला रहेगा ।

2. नए बिल किसानों को इंटरस्टेट ट्रेड (अंतरराज्यीय व्यापार) को प्रोत्साहित करते हैं, किसान अपने उत्पादों को दूसरे राज्य में स्वतंत्र रूप से बेच सकेंगे ।

3. वर्तमान में APMCs की ओर से विभिन्न वस्तुओं पर 1% से 10 फीसदी तक बाजार शुल्क लगता है, लेकिन अब राज्य के बाजारों के बाहर व्यापार पर कोई राज्य या केंद्रीय कर नहीं लगाया जाएगा।

4. किसी APMC टैक्स (या कोई लेवी और शुल्क आदि) का भुगतान नहीं होगा। इसलिए और कोई दस्तावेज की जरूरत नहीं ।

खरीदार और विक्रेता दोनों को लाभ मिलेगा (निजी कंपनियों और व्यापारियों की ओर से APMC टैक्स का भुगतान होगा, किसानों की ओर से नहीं)।

5. किसान कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग या अनुबंध खेती के लिए प्राइवेट प्लेयर्स या एजेंसियों के साथ भी साझेदारी कर सकते हैं ।

6. कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग निजी एजेंसियों को उत्पाद खरीदने की अनुमति देगी – कॉन्ट्रेक्ट केवल उत्पाद के लिए होगा । निजी एजेंसियों को किसानों की भूमि के साथ कुछ भी करने की अनुमति नहीं होगी और न ही कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग अध्यादेश के तहत किसान की जमीन पर किसी भी प्रकार का निर्माण होगा ।

7. वर्तमान में किसान सरकार की ओर से निर्धारित दरों पर निर्भर हैं ।लेकिन नए आदेश में किसान बड़े व्यापारियों और निर्यातकों के साथ जुड़ पाएंगे, जो खेती को लाभदायक बनाएंगे ।

8. प्रत्येक राज्य में कृषि और खरीद के लिए अलग-अलग कानून हैं । एक समान केंद्रीय कानून सभी हितधारकों (स्टेकहोल्डर्स) के लिए समानता का अवसर उपलब्ध कराएगा ।

9. नए बिल कृषि क्षेत्र में अधिक निवेश को प्रोत्साहित करेंगे क्योंकि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। निजी निवेश खेती के बुनियादी ढांचे को और मजबूत करेगा और रोजगार के अवसर पैदा करेगा।

10. APMC प्रणाली के तहत केवल लाइसेंस प्राप्त व्यापारी जिसे आड़तिया (बिचौलिया) कहा जाता है, को अनाज मंडियों में व्यापार करने की अनुमति थी, लेकिन नया विधेयक किसी को भी पैन नंबर के साथ व्यापार करने की अनुमति देता है ।

11. इससे बिचौलियों का कार्टेल टूट जाएगा – जो पूरे भारत में एक अहम मुद्दा है ।

12. नया बिल बाजार की अनिश्चतिता के जोखिम को किसान से निजी एजेंसी और कंपनी की ओर ट्रांसफर करेगा।

क्या कहता है डेटा?

2015 में आई शांता कुमार समिति की रिपोर्ट के मुताबिक 94% किसान पहले से ही निजी कंपनियों और व्यापारियों को अपने उत्पाद बेच रहे हैं. APMC मंडियों में केवल 6% किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में सरकारी खरीद एजेंसियों को अपने उत्पाद बेचते हैं, लेकिन उन पर (6% किसानों) निजी कंपनियों और व्यापारियों को उत्पाद बेचने के लिए कोई प्रतिबंध नहीं है ।

भारत की सरकारी खरीद में पंजाब और हरियाणा का हिस्सा लगभग 90% है। शेष खरीद ज्यादातर मध्य प्रदेश, राजस्थान और कुछ अन्य राज्यों से होती है. इसलिए अधिकतर राज्य पहले से ही खरीद योजनाओं से बाहर हैं।

बिलों को लेकर क्या हैं आशंकाएं

1. पंजाब और हरियाणा में – वर्तमान समय में फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया जैसी एजेंसियां किसानों का 100 फीसदी गेहूं और चावल आदि खरीद कर उसपर एमएसपी की सहूलियत देती है, लेकिन किसान संगठनों और विपक्षी पार्टियों को शक है कि निजी मंडिया खुल जाने से सरकारी एजेंसियों की प्रोक्योरमेंट काफी घट जाएगा. बाकी उपज कौन खरीदेगा- इसका जवाब निजी एजेंसियां हैं, जो किसानों की निजी खरीद पर निर्भरता बढ़ाएगा ।

2. चावल पंजाब और हरियाणा में केवल खरीद के लिए पैदा किया जाता है क्योंकि यहां स्थानीय खपत बहुत कम है. भविष्य में चावल की पूरी उपज निजी खरीद पर निर्भर हो सकती है ।

3. किसान और किसान यूनियनों को डर है कि कॉरपोरेट्स कृषि क्षेत्र से लाभ प्राप्त करने की कोशिश करेंगे ।

4. किसान इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि बाजार कीमतें आमतौर पर MSP कीमतों से ऊपर या समान नहीं होतीं । (हर साल 23 फसलों के लिए MSP घोषित होता है)

5. केंद्र ने MSP प्रणाली को जारी रखने का बेशक आश्वासन दिया होगा, लेकिन भविष्य में इसके चरणबद्ध ढंग से समाप्त होने की संभावना है ।

6. विधेयकों से खाद्य पदार्थों के संग्रहण पर मौजूदा प्रतिबंधों को हटाने का इरादा दिखता है । ऐसी आशंकाएं हैं कि बड़े प्लेयर्स और बड़े किसान जमाखोरी का सहारा लेंगे जिससे छोटे किसानों को नुकसान होगा, जैसे कि प्याज की कीमतों में ।

7. APMC के स्वामित्व वाले अनाज बाजार (मंडियों) को उन बिलों में शामिल नहीं किया गया है जो इन पारंपरिक बाजारों को एक वैकल्पिक विकल्प के रूप में कमजोर करेगा ।

8. राज्य राजस्व को खो देंगे जो बाजार शुल्क के रूप में एकत्र किया गया है ।

पुराने APMC सिस्टम के काम करने का तरीका

1. आमतौर पर किसान अपने स्थानीय अनाज बाजार में जाते हैं और अपनी उपज को बिचौलिए को बेचते हैं जिसे आढ़ती कहा जाता है।

2. किसानों को राज्य के बाहर अपनी उपज बेचने की अनुमति नहीं है और यदि वे ऐसा करते हैं तो उन्हें संबंधित राज्य एपीएमसी को बाजार शुल्क का भुगतान करना होगा – जो कि 6% तक है।

3. भारतीय खाद्य निगम (FCI) जैसी कुछ राज्य और केंद्रीय एजेंसियां जन वितरण प्रणाली (PDS) आदि के लिए तय MSP पर इन बिचौलियों के माध्यम से खाद्यान्न की खरीद करती हैं।

4. भले ही बाजार में कीमतें अधिक हों, किसानों को लाभ नहीं मिलता है या उनकी कोई भूमिका नहीं होती है ।

5. ये बिचौलिए खाद्यान्न के अलावा कृषि उपज भी खरीदते हैं और इसे थोक विक्रेताओं को ऊंचे दामों पर बेचकर मोटा मुनाफा कमाते हैं ।

6. ये बिचौलिए अक्सर जरूरतमंद किसानों को ऊंची ब्याज दर पर कर्ज देकर मनी लैंडिंग रैकेट भी चलाना शुरू कर देते हैं ।

7. किसान अपनी जमीन गिरवी रखकर इन निजी साहूकारों (ब्याज पर कर्ज देने वाले) से कर्ज लेते हैं । पंजाब में जितने किसानों ने खुदकुशी की, उनमें से अधिकतर के लिए जिम्मेदार इन बिचौलियों की ओर से चलाया जा रहा कर्ज देने वाले रैकेट ही है ।

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