हिंदी दिवस पर आयोजित हुआ सम्मान समारोह

आनंद कुमार चौबे (संवाददाता)

– विंध्य साहित्य सेवा सम्मान से सम्मानित हुए साहित्यकार

– विंध्य संस्कृति शोध समिति उत्तर प्रदेश ट्रस्ट द्वारा हुआ संगोष्ठी/सम्मान समारोह का हुआ आयोजन

सोनभद्र । साहित्य कला, संस्कृति, पर्यावरण के क्षेत्र में अनवरत दो दशकों से कार्यरत विभिन्न संस्कृति शोध समिति उत्तर प्रदेश ट्रस्ट द्वारा हिंदी दिवस के अवसर पर प्रधान कार्यालय में संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया ।
इस अवसर पर प्रख्यात साहित्यकार मधुरिमा साहित्य गोष्टी के निदेशक अजय शेखर एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित, शिक्षक, साहित्यकार ओम प्रकाश त्रिपाठी को ट्रस्ट के संस्थापक/ निदेशक दीपक कुमार केसरवानी द्वारा माल्यार्पण कर अंगवस्त्रम प्रदान कर हिंदी साहित्य सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात साहित्यकार एवं मधुरिमा साहित्यिक गोष्ठी के निदेशक अजय शेखर कहा कि-भाषा विद्वानों,वैज्ञानिकों के अनुसार हिंदी साहित्य का इतिहास वैदिक काल से आरंभ होता है वैदिक भाषा हिंदी थी परंतु इस भाषा का दुर्भाग्य रहा कि उसका नाम परिवर्तित होता रहा कभी-कभी संस्कृत प्राकृत अभी अपभ्रंश अब हिंदी।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक साहित्यकार ओम प्रकाश त्रिपाठी ने हिंदी भाषा के संबंध में अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि-“हिंदी साहित्य का आरंभ आठवीं शताब्दी से माना जाता है यह वह समय है जब सम्राट हर्ष की मृत्यु के बाद देश में अनेक छोटे-छोटे शासन केंद्र स्थापित हो गए, जो परस्पर संघर्षरत रहा करते थे, विदेशी मुसलमानों से भी इनकी टक्कर होती रहती थी, धार्मिक क्षेत्र अस्त-व्यस्त थे, उत्तर भारत के अनेक भागों में बौद्ध धर्म का प्रचार था। बौद्ध धर्म का विकास कई रूपों में हुआ, इनमें बजयानी तांत्रिक आते हैं जो जनता के बीच समय-समय पर जाकर हिंदी भाषा और अपने मत का प्रचार किया। हिंदी का प्राचीनतम साहित्य द्वारा तत्कालीन लोक भाषा में लिखा गया इसके बाद उन्होंने हिंदी भाषा का प्रचार किया, तत्पश्चात जैन धर्म की रचनाएं मिलती है।
कार्यक्रम के संयोजक एवं विंध्य संस्कृति शोध समिति उत्तर प्रदेश ट्रस्ट सोनघाटी पत्रिका के प्रधान संपादक दीपक कुमार केसरवानी ने अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि-“सन 1918 में स्वतंत्रता आंदोलन की अगुवाई करने वाले महात्मा गांधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए कहा था। स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर 1949 को संघ की राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी और लिपि देवनागरी स्वीकार किया गया।
14 सितंबर को ही व्यवाहौर राजेंद्र सिन्हा का 50 वां जन्मदिन था, इन्होंने स्वतंत्रता के पश्चात हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिस्थापित करवाने के लिए साहित्यकार काका कालेकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविंद दास आदि साहित्यकारों के साथ मिलकर अथक प्रयास किया था इसलिए 14 सितंबर को ही हिंदी दिवस लागू किया गया।
वरिष्ठ पत्रकार मीडिया फोरम आफ इंडिया के उपाध्यक्ष मिथिलेश प्रसाद द्विवेदी ने अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि-“भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी भाषा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है,महात्मा गांधी सहित देश के प्रख्यात आंदोलनकारी नेता गैर हिंदी भाषी होते हुए भी उन्होंने हिंदी भाषा में अपने साहित्य, समाचार पत्र का लेखन और प्रकाशन किया,हिंदी भाषा को स्वतंत्रता आंदोलन के हथियार के रूप में प्रयोग किया। जिसके कारण भारत की जनता अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए उमड़ पड़ी और अंततः अंग्रेजों को देश के बाहर जाना पड़ा।
साहित्यकार प्रतिभा देवी ने हिंदी साहित्य के विकास में नारी के योगदान पर चर्चा करते हुए कहा कि-“नारी आदि काल से लेकर आज तक साहित्य, भाषा की संरक्षिका रही है। चाहे वह वाचिक परंपरा का साहित्य हो अथवा लिखित परंपरा का साहित्य रहा हो, स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं का योगदान इतिहास के स्वर्णाक्षरों में अंकित है, वही हिंदी भाषा के संरक्षण एवं साहित्य लेखन की परंपरा स्वाधीनता के पूर्व स्त्रियों द्वारा की गई थी।
वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार, शिक्षक, भोलानाथ मिश्र ने अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि-“हिंदी साहित्य और समय की अभिव्यक्ति करने वाली नारी साहित्यकारों में मुख्य रूप से सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा, सरोजिनी नायडू, उषा देवी मिश्रा आदि महिला साहित्यकारों का योगदान रहा है। स्वतंत्रता के पश्चात लेखिका मन्नू भंडारी, उषा प्रियंवदा, चंद्रकिरण, सोन रिक्शा, शशि प्रभा शास्त्री, दीप्ति खंडेलवाल, मेहरुन्निसा परवेज, कृष्णा सोबती, शिवानी निरुपमा सेवती एवं अपनी व्यथा कथा को लिपिबद्ध करने वाली लेखिका तस्लीमा नसरीन का उपन्यास एवं कविता संग्रह पाठकों में अच्छा खासा लोकप्रिय रहा,सामाजिक और राजनीतिक चिंतन से मुक्त महिला साहित्यकारों द्वारा जिंदगीनामा, महाभोज, अनित्य, सात नदियों का समंदर आदि उपन्यास लिखे गए, जिसमें महिलाओं की साहित्यिक योग्यता झलकती है।
शिक्षिका कुमारी कु० तृप्ति केसरवानी ने अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि-“हिंदी साहित्य के क्षेत्र में नारी का सशक्त योगदान रहा है।स्वाधीनता के बाद नारी लेखन में मुक्ति का स्वरूप और नारी भावनाओं की यही अभिव्यक्ति जो सदियों से भीतर ही भीतर छटपटा रही थी और आज नारी लेखन में ही अभिव्यक्त हुई नारी ने ही नारी की पीड़ा को शब्द दिए उनके जीवन की व्यथा को लिखा।
इस अवसर पर कवि सुशील “राही” शिव नारायण “शिव” अमरनाथ ने हिंदी दिवस पर आधारित कविता के माध्यम से श्रोताओं की वाहवाही लूटी एवं कार्यक्रम में अनुपम त्रिपाठी, मानवेंद्र त्रिपाठी, हर्षवर्धन केसरवानी सहित अनेक गणमान्य नागरिक, साहित्यकार, पत्रकार उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन शिक्षक पत्रकार साहित्यकार भोलानाथ मिश्र ने किया।

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