जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से करता है पितरों को श्राद्ध उसके कुल में नही होता हैं कोई दुखी

श्राद्ध, पूर्वजों की स्मृति को अक्षुण रखने का धार्मिक साधन है। श्राद्ध पक्ष में पितरों से प्रार्थना करें कि हमारी पूजा स्वीकार करें और हमारे अपराधों को क्षमा करें। सबसे पहले श्राद्ध का उपदेश महातपस्वी अत्रि मुनि ने महर्षि निमि को दिया था। सबसे पहले महर्षि निमि ने श्राद्ध का आरंभ किया। इस अवधि में सूर्य कन्या राशि पर गोचर करते हैं। इसलिए इसे कनागत भी कहते हैं।

जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से श्राद्ध करता है, उसके कुल में कोई दुखी नहीं होता है। वह स्वस्थ, दीर्घायु, धनी होता है। पितृपक्ष में कोई भी शुभ कार्य, विशेष पूजा-पाठ और अनुष्ठान नहीं करना चाहिए। नित्य पूजा को बंद नहीं करना चाहिए। श्राद्ध के दौरान रंगीन फूलों का प्रयोग वर्जित है। श्राद्ध में सफेद पुष्प का प्रयोग करना चाहिए। श्राद्ध में चांदी के पात्रों का विशेष महत्व है। चांदी की उत्पत्ति भगवान शिवशंकर के नेत्र से हुई है इसलिए यह पितरों को प्रिय है। घर, गोशाला, देवालय, पवित्र नदियों के तट पर श्राद्ध करने का विशेष महत्व है। श्राद्ध का भोजन ग्रहण करने का अधिकार ब्राह्मण को है। श्राद्ध में भोजन के समय मौन रहना चाहिए। भोजनकर्ता को भी श्राद्ध के भोजन की प्रशंसा या निंदा नहीं करनी चाहिए। लोहे के पात्र का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ब्राह्मण को पत्तल-दोने या चांदी की थाली में भोजन कराना चाहिए। कौए को पितरों का रूप माना जाता है। श्राद्ध का प्रथम अंश कौओं को दिया जाता है। पिता का श्राद्ध अष्टमी और माता का नवमी पर किया जाना चाहिए। जिनकी मृत्यु दुर्घटना, आत्मघात के कारण या अचानक हुई हो, उनका चतुदर्शी का दिन नियत है। साधु सन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी पर किया जाना चाहिए। जिनके बारे में कुछ भी मालूम नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस पर किया जाता है। इसे सर्वपितृ श्राद्ध कहते हैं।

नोट:
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

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