फिल्म ‘Pareeksha’ की समीक्षा

बॉलीवुड पिल्म ‘परीक्षा’ कहानी है एक स्कूली छात्र बुलबुल कुमार की जो प्रतिभाशाली होकर भी अपने लिए बेहतर मौके की तलाश में है. लेकिन उसके पिता बूची पासवान रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पेट पालते हैं और उसके पास इतने पैसे नहीं है कि अपने होशियार बच्चे को अच्छी शिक्षा मुहैया करा सके. एक दिन बूची की किस्मत खुलती है और उसे अपने बच्चे का दाखिला प्राइवेट स्कूल में कराने के पैसे मिल जाते हैं. हालांकि यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकती और बच्चे को पढ़ाने के चक्कर में बूची एक रिक्शा चालक से चोर बन जाता है. हालांकि अंत में बच्चे की मेहनत रंग लाती है और वह स्कूल टॉपर बनकर उभरता है.

पूरी फिल्म अपने बच्चे के लिए एक माता-पिता के संघर्ष को दर्शाती है. साथ ही हमारे एजुकेशन सिस्टम पर भी एक चोट करती है, जिसमें एक प्रतिभाशाली गरीब बच्चे के सामने अच्छी शिक्षा पाने के लिए कैसी-कैसी मुश्किलें आती हैं. फिर उसी समाज से कोई मददगार खड़ा होकर बच्चे की मेहनत को अंजाम तक ले जाने में अहम भूमिका निभाता है.

कैसी है फिल्म में परफॉरमेंस?
कहानी भले ही स्कूली छात्र बुलबुल (शुभम) के इर्द-गिर्द घूमती हो लेकिन इसके असली हीरो बूची (आदिल हुसैन) हैं. फिल्म में उन्हें एक गरीब रिक्शा चालक के किरदार हो बखूबी निभाया है. साथ ही आदिल हुसैन आपको किरदार के मुताबिक खुद को ढालने की सफल कोशिश करते पर्दे पर दिखाई देंगे. वह पर्दे पर एक साधारण इंसान और अच्छे रिक्शा चालक के रूप में दिखाई देंगे जो अपने बेटे को अपने ही रिक्शे में सीट पर नहीं बैठाते क्योंकि इससे रिक्शे में जाने वाले अमीर बच्चों के माता-पिता को ऐतराज होता है.

बुलबुल की मां के रूप में राधिका (प्रिंयका बोस) का किरदार भी आपको एक गरीब और मजदूर मां की दुनिया में ले जाएगा. जो खुद के सपनों को छोटा कर अपने बच्चे की उड़ान को पंख लगाने का काम करती है. इसके अलावा बुलबुल की भूमिका निभा रहे शुभम भी पर्दे पर एक शांत और सौम्य छात्र के रूप में आपको दिख जाएंगे जिसे अपने परिवार की मजबूरी और अपनी मेहनत पर पूरा भरोसा है.

यह फिल्म बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद के जीवन के अनुभवों पर आधारित है. यही वजह है कि इस भूमिका को संजय सूरी ने निभाया है जो फिल्म में रांची के SP कैलाश आनंद बने हैं. कैलाश खुद भी काफी प्रतिभावान हैं और दिल्ली यूनिवर्सिटी के टॉपर रह चुके हैं. वह बूची को बताते हैं बच्चे को सरकारी स्कूल में भी पढ़ाकर भी अच्छा मुकाम हासिल किया जा सकता है और वह खुद इसका उदाहरण हैं. वह बूची पासवान की बस्ती में जाकर अपनी ड्यूटी से इतर बुलबुल समेत अन्य गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ाते हैं और अमीर बच्चों के माता-पिता से उनको बच्चों के कोचिंग देने से मना करते हुए कहते हैं कि आप लोगों के पास संसाधनों की क्या कमी है.

फिल्म के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर प्रकाश झा के लिए ऐसी फिल्म कोई नया अनुभव नहीं है. मृत्युदंड से लेकर अपहरण और गंगाजल से लेकर आरक्षण तक, वह ऐसी फिल्में पहले भी पर्दे पर लाते रहे हैं. उनकी फिल्में सामाजिक मुद्दों और सिस्टम की चुनौतियों को पर्दे पर उकेरने का काम पहले भी करती रही हैं. लेकिन इस बार बगैर किसी बिग स्टार के प्रकाश झा ने एक जरूरी और सार्थक फिल्म बनाई है. यह फिल्म 6 अगस्त को Zee5 पर रिलीज हुई है और वहीं इसे आप देख सकते हैं.


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