गुरु पूर्णिमा ब्यास पूर्णिमा के नाम से हैं जाना जाता, कई मान्यताओं से जुड़ा है यह पावन पर्व

आषाढ़ माह में पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार सबसे शुभ हिंदू त्योहारों में से एक है। इस दिन शिष्य अपने गुरु का आभार व्यक्त करते हैं। इस त्योहार से जुड़ी कई मान्यताएं इसे विशेष बनाती हैं। मान्यता है कि पहली बार इसी दिन आदियोगी भगवान शिवशंकर ने सप्तऋषियों को योग का ज्ञान देकर स्वयं को आदि गुरु के रूप में स्थापित किया। यह भी माना जाता है कि महर्षि वेद व्यास का जन्म भी इसी दिन हुआ था। महर्षि व्यास ने चारों वेदों एवं महाभारत की रचना की। इस कारण उनका नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से जाना जाता है।

मान्यता है कि इसी दिन महर्षि वेद व्यास ने शिष्यों एवं मुनियों को सबसे पहले श्री भागवत् पुराण का ज्ञान दिया था। आषाढ़ मास की पूर्णिमा पर महर्षि वेदव्यास के शिष्यों ने गुरु पूजा की परंपरा आरंभ की। यह भी माना जाता है कि भगवान बुद्ध ने इस शुभ दिन पर अपना पहला उपदेश दिया था। इसलिए इस तिथि को बुद्ध पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा से ही वर्षा ऋतु का आरंभ होता है। इस दिन से चार महीने तक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। हिंदू धर्म में गुरु को भगवान से भी ऊपर का दर्जा प्राप्त है। विद्यार्थियों के लिए यह दिन कल्याणकारी माना जाता है।

नोट:
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।


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