शाबान महीने की 15वीं रात को कहा जाता है शबे बारात- नसीरे मिल्लत

रमेश यादव ( संवाददाता )

– रजब बुवाई, शाबान सिंचाई व रमजान कटाई का महीना शाबान के रोजे का बड़ा सवाब

दुद्धी । दारुल उलूम कादरिया नूरिया अरबी महाविद्यालय के संस्थापक व सुन्नी जमात के धर्मगुरु हजरत नसीरे मिल्लत ने गुरुवार को मनाई जाने वाली शबे बारात की बावत तकरीर करते हुए कहा कि इस्लामी साल का आठवां महीना शाबान कहलाता है। इस महीने की 15वीं रात को शबे बारात कहा जाता है। इसे फरिश्तों के ईद की रात भी कहते हैं। यह गुनाहों से माफी मांगने और बख्शिश की दुआ करने की रात है। इस रात हमारे आमाल (इबादतें वगैरह) अल्लाह के दरबार में पेश की जाती हैं। जो लोग अपने गुनाहों पर तौबा कर के रब से माफी मांगते हैं, अल्लाह पाक उनके गुनाह बख्श देता है। उन्हें नामुराद ना करके अपने रहमतों से नवाजता है। हजरत ज़ुन्नुन मिसरी रहमतुल्लाह अलैह फरमाया करते कि रजब का महीना खेती बोने के लिए है। शाबान का महीना सिंचाई करने के लिए और रमजान का महीना फसल काटने के लिए है। आदमी वही काटता है जो वह बोता है। जो आदमी फसल बर्बाद कर देता है वह कटाई के मौसम में शर्मिंदा होता है। उस वक्त पछताने के सिवा कुछ नहीं मिलता। इसलिए ऐसी मुबारक रातों में अपने बख्शिश और गुनाहों से माफी मांगने के लिए रो-रोकर दुआएं मांगनी चाहिए। यह मुबारक मौका हमें साल में एक ही बार नसीब होता है। इस मुबारक रात अल्लाह पाक साल भर के फैसले फरमाता है। अल्लाह के रसूल इस रात खूब इबादत किया करते थे। अपनी उम्मत के लिए दुआएं मांगते। अगर हम अपनी गफ़लत से यह मुबारक रात आम रातों की तरह गुजार दें तो हमारी कितनी बड़ी कमनसीबी होगी। हमें यह ख्याल तक नहीं होता है कि क्या मालूम यह साल हमारी जिंदगी का आखरी साल हो। कब मौत का पैगाम आ जाए इसलिए खुदा के खौफ से हमें आखिरत सवारने की फिक्र होनी चाहिए। खुदा की खास रहमतैं नाजिल होने वाली रातों में एक रात यह भी है। अफसोस हम अपने नबी से मोहब्बत का दावा तो करते हैं लेकिन अपनी सुन्नत पर अमल नहीं करते। इस रात इबादत करने और माफी मांगने के बजाय हम तफरीह और खासकर आतिशबाजी में लगे रहते हैं। यह हराम और नाजायज काम है। हमारी इस हरकत से अल्लाह और उसके रसूल नाराज होते हैं। रहमत के फरिश्ते हमारे घरों में नहीं आते। शाबान में रोजा रखने का बड़ा सवाब है। अल्लाह के रसूल फरमाते हैं कि रमजान के रोजे के बाद सबसे अफजल रोजों में शाबान के रोजे शुमार हैं। इससे रोजेदार के लिए रमजान के रोजे आसान हो जाते हैं। अल्लाह के रसूल ने हमें बशारत देते हुए फरमाया कि जो आदमी शाबान के आखिरी सोमवार को रोजा रखेगा अल्लाह पाक अपने फ़ज़्ल से उसके पिछले गुनाह माफ फरमा देगा। इस मौके पर हलवा पकाना, खाना और खिलाना जायज है। लेकिन इसे ही शबे बारात का मतलब समझ लेना नादानी है। कुछ लोग हलवा इसलिए बनाते और फातिहा दिलाते हैं कि चूंकि हजरत ओवैस करनी रदिअल्लाहो अन्हो ने जंगे उहुद के मौके पर सरकारे दो जहां के मुबारक दांत शहीद हो जाने की खबर पाकर अपने दांत तोड़ डाले थे, इसलिए हलवा जैसी नरम चीज उनके लिए फातिहा दिलाई जाए। प्यारे दीनी भाइयों ऐसा सोचना और करना गलत है। हम जिन्हें ईसाले सवाब करते हैं वह हजरत हमारे खाने नहीं खाते बल्कि उससे जो सवाब मिलता है वह उन्हें पहुंचता है। इसलिए इस ख्याल से हलवा पकाने का एहतमाम करना सही नहीं। अल्लाह के नजदीक 4 महीने बड़े फजीलत वाले हैं। मुहर्रम, रज्जब, शाबान और रमजान। इन महीनों में अल्लाह पाक ने हमारे लिए खास रातें अता की है। ताकि हम अपने गुनाहों पर शर्मिंदा होकर अपने रब से अपने माफी की दुआ मांगे। हमारा करीम रब अपने करम से हमारे गुनाहों को माफ फरमा दे। अल्लाह करे हम ऐसा कर सकें।
इस्लाहुल मुस्लेमीन कमेटी जामा मस्जिद दुद्धी के सदर मु. शमीम अंसारी ने मुस्लिम समुदाय के लोगों से 9 तारीख दिन जुमेरात की बाद नमाज मगरिब शबे बारात मनाने, रात में शब्बेदारी करने, जुमेरात व जुमा को रोज रखने तथा लॉक डाउन की वजह से कब्रिस्तान न जाकर अपने घरों से ही नियाज-फातेहा करने की अपील की है।



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