नागरिकता कानून को लेकर देशभर में उबाल, नहीं थम रहा बवाल

अनुच्छेद-370 को हटाने जैसे बड़े फैसले के बाद अब मोदी सरकार के एक और कानून पर बवाल हो गया है। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के संसद से पास होने के बाद से ही सड़कों पर इसके खिलाफ विरोध जारी है, विपक्षी नेता, कई संगठन इसे संविधान विरोधी करार दे रहे हैं । हालांकि, सरकार की ओर से कोशिश की जा रही है कि प्रदर्शन और हिंसा ना हो । हिंसक प्रदर्शन को सरकार विपक्ष की साजिश करार दे रही है लेकिन जनता के बीच जो गुस्सा है उसे शांत नहीं कर पा रही है । सरकार में इस कानून को लेकर कन्फ्यूजन इसलिए भी है क्योंकि CAA के बाद देशभर में NRC लागू करने की जो बात कही जा रही है उसपर स्थिति साफ नहीं है। सरकार ने भी जवाब दिए हैं लेकिन वे स्थिति साफ करने के बजाय कन्फ्यूजन को और बढ़ाते हुए दिखते हैं ।

मोदी सरकार भले ही कह रही हो कि नागरिकता संशोधन एक्ट का देश के नागरिकों से कोई लेना-देना नहीं है और उनको इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। लेकिन जनता में इस बात का डर है कि नागरिकता संशोधन एक्ट, नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन का ही हिस्सा है । साथ ही ये भी कहा जा रहा है कि देश के सभी लोगों की अपनी नागरिकता साबित करनी होगी, जिसमें उनकी पुरानी पीढ़ियों की जानकारी, सभी कागजात सरकार को दिखाने होंगे ।

कहा ये भी जा रहा है कि ये एक्ट मुस्लिम विरोधी है क्योंकि जो गैर-मुस्लिम NRC में खुद की नागरिकता साबित नहीं कर पाएंगे उन्हें CAA के तहत नागरिकता मिल जाएगी । लेकिन अगर कोई मुस्लिम खुद की नागरिकता साबित नहीं कर पाएगा, तो उसके साथ घुसपैठियों जैसा व्यवहार किया जा सकता है । जनता के बीच फैले इस कन्फ्यूजन को दूर करने की कोशिशें सरकार की ओर से की जा रही हैं । लेकिन मौजूदा तनाव को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि ये सफल नहीं हो रही हैं ।

चुनावी रैलियों में लगातार भाजपा नेताओं की ओर से बयान दिए गए थे कि जिस तरह असम में NRC लागू हुई, उसी तरह पूरे देश में इसे लागू किया जाएगा । गृह मंत्री अमित शाह ने भी एक कार्यक्रम में कहा था कि पहले CAA आएगा और उसके बाद NRC आएगा । इसी को आधार बनाकर विपक्ष की ओर से लगातार सरकार पर निशाना साधा गया और केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाए गए ।

दरअसल, हाल ही में जब असम में NRC लागू की गई थी तो 19 लाख लोगों का नाम उसमें शामिल नहीं था। इसमें पूर्व सैनिक, नेताओं के परिवार, यूपी-बिहार के लोगों समेत काफी ऐसे लोग थे जो कि खुद की नागरिकता साबित नहीं कर पाए थे। असम का यही उदाहरण जनता के बीच भय का माहौल बना रहा है और उनकी प्रतिक्रिया सरकार के लिए चिंता का विषय बन रही है ।

इस कन्फ्यूजन के बीच मोदी सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि लोगों को CAA-NRC में अंतर समझाया जाए, इसके लिए अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन दिया गया । वहीं सवाल-जवाब की लिस्ट जारी की गई है, जिसमें इससे जुड़े 13 मुद्दों पर बात की गई है ।

सरकार के जवाब में बताया गया है कि NRC अभी लागू नहीं हुई है और अगर होती है तो उसमें नागरिकता साबित करना मुश्किल नहीं है, क्योंकि इसमें उन्हीं कागजातों की जरूरत होगी जो आधार कार्ड या वोटर आईडी कार्ड बनाने के लिए होती है । ऐसे में सरकार जब इसे लागू करेगी तो जनता को सूचित किया जाएगा ।

एनआरसी को लेकर देश के एक बड़े तबके में खौफ का माहौल है लेकिन उसके सवालों का जवाब सरकार की सफाई में नहीं है । एनआरसी को लेकर जो सवाल हैं उनमें से कई के जवाब गोलमोल ढंग से दिए गए हैं । मसलन सरकार ये साफ नहीं कर रही कि अगर पूरे देश में एनआरसी लागू होती है और उसकी तारीख असम की तरह 1971 नहीं होगी तो क्या होगी? नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज कौन-कौन से होंगे?

इस सवाल पर सरकार सिटिजनशिप एक्ट का तो हवाला देती है लेकिन साथ ही ये भी कह देती है कि इसके लिए नियम और प्रक्रिया बनाई जाएगी । यानी हो सकता है कि वोटर आईकार्ड, आधार जैसे सामान्य पहचान कार्ड के अलावा भी कोई दस्तावेज इसके लिए मांगने का नियम बना दिए जाए जिसे जुटाना एक बड़ी आबादी के लिए मुश्किल हो ।

पूर्वोत्तर खासकर असम में नागरिकता कानून को लेकर जो आक्रोश है उसकी वजह अलग है। असम में लंबे संघर्ष के बाद एनआरसी लागू हुई और उसमें लाखों की आबादी ऐसी पहचानी गई जो अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाई । लेकिन नए नागरिकता कानून से इस पूरी कवायद पर ही पलीता लगा दिया है ।

असम की एनआरसी में जो लाखों गैर मुस्लिम अपनी जगह नहीं बना पाए हैं उन्हें नागरिकता संशोधन कानून नागरिकता देने की बात कहता है । सरकार न तो ये साफ कर पा रही है कि इन गैर मुस्लिमों के साथ क्या सुलूक किया जाएगा और न एनआरसी के बाहर के मुस्लिमों को वापस भेजने के रोडमैप को सामने रख पाई है ।

देशभर में नए नागरिकता कानून की जो प्रतिक्रिया हुई है उसे लेकर सरकार भी सकते में नजर आ रही है । सरकार के मंत्रियों के बयान देखकर लगता है कि उनके लिए देशभर में इसके खिलाफ हो रही हिंसा अप्रत्याशित है । माना जा रहा है कि सरकार स्थिति का आकलन करने में चूक गई क्योंकि कानून पास होने के बाद जब देश के कई हिस्सों से हिंसा की खबरें आईं तब जाकर उसकी ओर से कानून पर उठ रहे सवालों के जवाब का विज्ञापन किया गया। सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि सीएए से ज्यादा सवाल एनआरसी को लेकर उठ रहे हैं।

असल गुस्सा भी एनआरसी को लेकर है लेकिन सरकार के पास उनका कोई जवाब नहीं है । सरकार बस भविष्य में नियम बनाने की बात कह रही है जो पहले से ही आशंकित मुस्लिमों के संदेह को और बढ़ाने का काम कर रही है । माना जा रहा है कि अगर सीएए के साथ ही सरकार एनआरसी के नियम भी पब्लिक के सामने ले आती तो कन्फ्यूजन का माहौल दूर होता और आंदोलनकारियों को ज्यादा बेहतर ढंग से समझाया जा सकता था ।



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