सोलह कलाओं से परिपूर्ण श्रीकृष्ण का अवतार मुख्यत: आनंद प्रधान माना जाता है

घनश्याम पाण्डेय/विनीत शर्मा (संवाददाता)

चोपन। सिंदुरिया गांव में बाबा दूधनाथ शिव मंदिर के प्रांगण में हनुमान प्रसाद पाण्डेय के द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिवस कथा वाचक श्री शारदा नंदन जी ने कहा कि मथुरा के सुप्रसिद्ध धार्मिक स्थल वृंदावन में स्थित निधिवन में भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रास रचाकर महारास किया था यह महारास कार्तिक पूर्णिमा से प्रारंभ होकर चैत्र मास की पूर्णिमा को समाप्त हुआ था।

सोलह कलाओं से परिपूर्ण श्रीकृष्ण का अवतार मुख्यत: आनंद प्रधान माना जाता है। उनके आनंद भाव का पूर्ण विकास उनकी मधुर रस लीला में हुआ,यह मधुर रस लीला उनकी दिव्य रास क्रिड़ा है।जो श्रृंगार और रस से परिपूर्ण होते हुए भी इस स्थूल जगत के प्रेम व वासना से मुक्त है। श्रीमद्भागवत में दशम स्कंध के २९ से ३३ अध्याय तक में वर्णित श्री रास पंचाध्यायी के नाम से प्रसिद्ध है।यह भागवत रूपी शरीर के प्राण व हृदय है।

पंच प्राणों का ईश्वर के साथ रमण ही रास है। यह लीला लौकिक सृष्टि के स्तर से ऊपर थी, इसमें ईश्वर और जीव का मिलन वर्णित है। इस लीला की कुछ मर्यादाएं थी जैसे किसी के शरीर से किसी का कोई लेना देना नहीं था, लौकिक काम का अंश नहीं, किसी स्त्री का प्रवेश वर्जित शुद्ध जीव का प्रवेश संभव था,यह अंश और अंशी का पवित्र मिलन था।

कथा के आगे क्रम में मथुरा के राजा कंस का अत्याचार बढ़ता जा रहा था भगवान को मारने के लिए अनेक राक्षसों को रूप बदल कर भेजा किन्तु भगवान ने सबका वध कर दिया फिर कंस ने कूटनीति के तहत मल्लयुद्ध का आयोजन किया जिसमें श्रीकृष्ण और बलराम को भी बुलाया गया कंस के बहादुर दैत्यों मुश्तिक और चारुण के साथ भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का मल्लयुद्ध हुआ जिसमें बलराम ने मुश्तिक को और श्रीकृष्ण ने चारूण को मृत्युदंड दिया और कंस को ललकारते हुए कहा कि मामा तुम्हारे पाप का घड़ा भर चुका है अब युद्ध के लिए तैयार हो जाओ और भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध कर पृथ्वी को पाप मुक्त किया।अंत में भगवान श्रीकृष्ण के साथ रूक्मिणी के विवाह के रोचक प्रसंग पर विस्तार से प्रकाश डाला गया।



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