Wednesday, November 13, 2019 - 08:20 AM
धर्म-कर्म

इस व्रत के प्रभाव से संतान के जीवन में संकट और कष्टों से होती हैं रक्षा

18

कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है। अहोई अष्टमी का व्रत करवाचौथ के चार दिन बाद और दीपावली से आठ दिन पहले आता है। इस दिन महिलाएं अहोई माता का व्रत रखती हैं और विधि विधान से पूजा अर्चना करती हैं। इस व्रत में मां पार्वती की उपासना की जाती है। माता पार्वती संतान की रक्षा करने वाली हैं। इस व्रत के प्रभाव से संतान के जीवन में संकट और कष्टों से रक्षा होती है। इस दिन से दीपावली उत्सव का आरंभ हो जाता है।
इस दिन को कृष्णा अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। मथुरा के राधाकुंड में इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पावन स्नान करने आते हैं। अहोई अष्‍टमी का व्रत संतान की लंबी आयु के लिए रखा जाता है। अहोई का अर्थ है अनहोनी से बचाना। बच्‍चों की रक्षा के लिए माताएं इस दिन व्रत रखती हैं। संतान की कामना के लिए भी यह व्रत रखा जाता है। इस व्रत को संतान प्राप्‍ति के लिए सर्वोत्‍तम माना गया है। इस व्रत में महिलाएं पूरे दिन जल की बूंद भी ग्रहण नहीं करती हैं। दिनभर व्रत के बाद शाम को तारों को अर्घ्‍य दिया जाता है। कुछ महिलाएं चंद्रमा का दर्शन करने के बाद व्रत को पूर्ण करती हैं, लेकिन इसका अनुसरण कठिन होता है क्योंकि अहोई अष्टमी पर चंद्रोदय देर से होता है। एक साल व्रत लेने के बाद आजीवन यह व्रत टूटना नहीं चाहिए। पुत्रियों के सौभाग्य के लिए भी अहोई माता कृपालु होती हैं। माता अहोई को लाल रंग के पुष्प अर्पित करें। अहोई अष्‍टमी व्रत की कथा पढ़ें। पूजा के बाद घर की बड़ी महिला के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लें।

नोट:
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

अपने शहर के एप को डाउनलोड करने के लिए क्लिक करे |  हमें फेसबुक,  ट्विटर,  और यूट्यूब पर फॉलो करें|
loading...